माँगी थीं
जब बिजलियाँ,
उमड़कर
काली घटाएँ आ गयीं।
देखे क्या जन्नत के
दिलकश ख़्वाब,
सज-धजकर
गर्दिश की बारातें आ गयीं।
चाही हर शय
हसीं जब भी,
बेरहम हो
आड़े
वक़्त की चालें आ गयीं।
इंतज़ार था
कि आँखों से बात हो,
तिनकों के साथ
ज़ालिम हवाऐं आ गयीं।
दर्द-ए-जिगर से
राहत माँगी थी एक दिन
नश्तरों की ज़ख़्म पर
बौछारें आ गयीं।
चाहा था एक दिन
पीना ठंडा पानी ,
लेकर वो तश्तरी-ए-अश्क़ में
सुनामी लहरें आ गयीं।
# रवीन्द्र सिंह यादव