सपनों की
भव्य अट्टालिकाओं को
ढह जाना होता है
नयनों में उमड़े
दर्दीले आँसुओं को
बस बह जाना होता है
उपवन के सौंदर्य में लवलीन
रसिक मन को
काँटों का चुभना
सह जाना होता है
चन्द्रिका बिखर जाती है
अँधेरी राहों को
रौशन करने
तब
जुगनुओं के दिल को
रंजिशों के साथ
कृष्णपक्ष तक
चुप रह जाना होता है।
© रवीन्द्र सिंह यादव
