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मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

रंजिशों के साथ

सपनों की 

भव्य अट्टालिकाओं को 

ढह जाना होता है

नयनों में उमड़े 

दर्दीले आँसुओं को 

बस बह जाना होता है

उपवन के सौंदर्य में लवलीन

रसिक मन को 

काँटों का चुभना 

सह जाना होता है

चन्द्रिका बिखर जाती है 

अँधेरी राहों को 

रौशन करने 

तब 

जुगनुओं के दिल को 

रंजिशों के साथ 

कृष्णपक्ष तक 

चुप रह जाना होता है।  

© रवीन्द्र सिंह यादव

    

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