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सोमवार, 22 जून 2026

सीढ़ी जो उदास थी...


                             चित्र साभार : गूगल 

बुज़ुर्ग सीढ़ी क्या कहे अपनी दास्तान 

रोती है ज़ार-ज़ार हो जब सूना मकान

बेफ़िक्र उत्सुक हो चढ़ जाते हैं सीढ़ी 

भूतल को सँभलकर उतरते हैं सीढ़ी 


ममता, प्रेम, घृणा, आकांक्षा 

सब चढ़े-उतरे हैं सीढ़ी से 

निर्माता के उर में उतर गयी है 

भव्य नियोजित सीढ़ी-दर-सीढ़ी 


इस सीढ़ी का वैभवपूर्ण इतिहास 

लिखेगा कोई धीर शोधार्थी 

आधुनिकता के अंधड़ में सूनी हुई तो क्या 

सीढ़ी संग जीने वाले थे रसिक संगी-साथी.

©रवीन्द्र सिंह यादव

#सीढ़ी 

#stairs 

#past 

#history 

#life

#poetrywriting

रविवार, 14 जुलाई 2024

छल

ईवीएम के समाचार पढ़कर 

मुझे स्मरण हो आते हैं शकुनि के प्रबल पासे

वे सत्ता-संपत्ति  के नहीं बल्कि थे रक्त के प्यासे

द्रौपदी द्वारा दुर्योधन का उपहास 

बन गई गले की चुभनभरी फाँस   

शक्ति,साधन,मर्यादा,दर्प और ऐश्वर्य 

शकुनि के पासों के आगे नत-मस्तक

छल बल है निरपराध के लिए घातक  

नियम पालन की नैतिकता से बँधे रहे महारथी चुपचाप  

स्त्री-गरिमा होती तार-तार देखते रहे शीश झुकाए क्रूरता का वीभत्स नाच

इतिहास का असहज सत्य 

तबाही के उपरांत आ खड़ा होता है 

कहता है-

छल आश्रय लेता है 

सहसा अनैतिकता के भंडार में! 

 ©रवीन्द्र सिंह यादव 


बुधवार, 25 मई 2022

समय का वज्र

 व्यथा का तम 

और कितना 

सघन होगा? 

अँधेरे-उजाले के मध्य 

प्रतीक्षा के पर्वत के छोर पर 

कब प्रभात के तारे का 

सुखद आगमन होगा?  

लोक-मानस में 

अधीरता के आयाम 

इतिहास की उर्वरा माटी पर 

संप्रति 

कोई  तो

सर्जना के संवर्धन की 

तबीयत समझ    

लिखता जा रहा है

बहारों की आहट

अभी दूर है 

वक़्त को यही मंज़ूर है

इस कठोरता को 

रेखांकित कर दिया गया है। 

© रवीन्द्र सिंह यादव




  


रविवार, 8 नवंबर 2020

चुल्लूभर पानी

 तुम्हारे लिए 

कोई 

चुल्लूभर पानी 

लिए खड़ा है 

शर्म हो 

तो डूब मरो... 

नहीं तो 

अपनी गिरेबाँ में 

बार-बार झाँको 

ज़रा सोचो!

तुम्हारी करतूत 

इतिहास का 

कौनसा अध्याय 

लिख चुकी है?

पीढ़ियाँ 

जवाब देते-देते ऊब जाएँगीं।

© रवीन्द्र सिंह यादव

रविवार, 26 अप्रैल 2020

इतिहास

इतिहास पढ़ा 

ज़्यादातर ब्यौरा 

सत्ता के 

उत्थान और पतन का

सत्ता और संपत्ति के 

हस्तांतरण का 

अमीरों की जीवनशैली 

दर्शन,कलाप्रियता,क्रूरता 

और चरित्र के क़िस्से

सामाजिक राजनीतिक वातावरण के 

पुख़्ता दस्तावेज़ 

सभ्यता-संस्कृति के बीज-वृक्ष 

कुछ शासकों की नीतियाँ 

उत्पन्न करतीं खीझ 

बहुत कुछ 

दर्ज होने से छूट गया है 

ऐसा पुरखे बताते रहे  

समृद्ध इतिहास पर गर्व है 

यह तो पुरखों की की देन है 

हमारा किया-धरा 

भावी पीढ़ियाँ पढेंगीं

मजबूरन भुगतेंगीं  

सराहेंगीं या धिक्कारेंगीं 

वक़्त तय करेगा। 

© रवीन्द्र सिंह यादव 

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

यह तो समय तय करेगा

तुम फ़रिश्ता हो 

या शैतान 

तुम्हारे कर्म तय करेंगे, 

तुम रहनुमा हो 

या दिग्भ्रामक 

भावी पीढ़ी के लोग तय करेंगे। 


तुमने किसी को 

ऊपर उठाया है 

या रचीं थीं साज़िशें 

किसी को गिराने की 

इंतज़ार करो  

यह तो समय तय करेगा। 


तुम इंसानीयत के साथ थे 

या हैवानीयत के 

जब इतिहास लिखा जाएगा 

तो अवश्य दर्ज किया जाएगा। 


तुम्हारी हमदर्दी 

मज़लूम के साथ थी 

या ज़ालिम के

तुम्हारी कार-गुज़ारियों के क़िस्से  

दूर-दूर तक जाकर 

हवा चीख़-चीख़कर कहेगी।  

© रवीन्द्र सिंह यादव

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

रावण


रावण का 


विस्तृत इतिहास ख़ूब पढ़ा, 

तीर चलाये मनभर 

प्रतीकात्मक प्रत्यंचा पर चढ़ा।  

बुराई पर अच्छाई की 

लक्षित / अलक्षित विजय का, 

अभियान दो क़दम भी आगे न बढ़ा!

वक़्त की माँग पर 

ठिठककर आत्मावलोकन किया, 

तो पाया पुरातन परतों में 

वर्चस्व का काला दाग़ कढ़ा।  


©रवीन्द्र सिंह यादव



सोमवार, 29 जुलाई 2019

क्या-क्या नहीं करता है पेड़ दिनभर






















दिनकर की धूप पाकर 

भोजन बनाता है पेड़ दिनभर,

लक्ष्यहीन अतरंगित असम्पृक्त को 

   भटकन से उबारता है पेड़ दिनभर।  


चतुर्दिक फैली ज़हरीली हवा 

निगलता है पेड़ दिनभर, 

मुफ़्त मयस्सर प्राणवायु 

उगलता है पेड़ दिनभर। 


नीले शून्य में बादलों को 

दिलभर रिझाता है पेड़ दिनभर, 

आते-जाते थके-हारे परिंदों को 

बुलाता है पेड़ दिनभर।



कलरव की प्यारी सरगम 

उदासी में सुनता है पेड़ दिनभर, 

आदमी को अपनी नज़रों में 

उठता-गिरता देखता है पेड़ दिनभर।  


यूनिवर्सिटी में रिसर्च का 

विषय बनता पेड़ दिनभर, 

राजनीति के हाथों सजीले गड्ढे में 

रोपा जाता पेड़ दिनभर। 


पथिक को ठंडी हवा के झौंकों से 

दुलराता पेड़ दिनभर, 

साधनविहीन पाठशाला का 

आसरा बनता पेड़ दिनभर। 


बाग़बान को सुख-चैन की 

रागिनी सुनाता पेड़ दिनभर, 

कलाकारों की साधना का 

आयाम बनता पेड़ दिनभर। 


निर्विवाद इतिहास 

रचता है पेड़ दिनभर,

भौतिकता के अलबेले दौर का 

मज़ाक़ उड़ाता पेड़ दिनभर। 


फलों का भार लादे लचकदार होकर 

जीना सिखाता पेड़ दिनभर, 

पढ़ने जाती नन्हीं मुनिया को 

बढ़ते हुए देखता पेड़ दिनभर। 


खेतों में पसीना बहाते मेहनतकशों को 

मिलीं गालियाँ सुनता पेड़ दिनभर,

सबूत मिटाकर सफ़ेदपोश बने 

अपराधी के अपराध गिनता है पेड़ दिनभर। 


क्या-क्या नहीं करता है पेड़ दिनभर... 

सारे भले कार्य करता है पेड़ दिनभर,

मरकर भी हमारा पेट भर जाता है शजर  

फिर क्यों काटा जाता है पेड़ दिनभर ? 

© रवीन्द्र सिंह यादव 




शनिवार, 19 मई 2018

आओ! राष्ट्रीय-चरित्र पर मंथन करें.....

आओ!
मनगढ़ंत, मनपसन्द, मन-मुआफ़िक, मन-मर्ज़ी का 
इतिहास पढ़ें, 
अज्ञानता का विराट मनभावन 
आनंदलोक गढ़ें। 
आओ! 
बदल डालें 
सब इमारतों, गलियों, शहरों, सड़कों, संस्थानों के नाम, 
लिख दें बस अपने-अपनों के नाम। 
आओ! 
बदल डालें 
कुछ क़ानून-क़ाएदे भी, 
होंगे दूरगामी फ़ाएदे भी।  
आओ! 
पाठ्यक्रम भी बदल डालें,
अपनों को उपकृत करें और बौद्धिक विकास में भी ख़लल डालें।  
आओ! 
पेपर लीक कर लें,
प्रतिभा को रौंदकर अपनी तिजोरी भर लें। 
आओ! 
 कॉर्पोरेट के तलवे चाटें, 
राष्ट्रीय सम्पदा लुटाएँ और चंदे की ख़ैरात को आपस में बाँटें।  
आओ!
बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक खेल खेलें,
काटें नफ़रत से उगाई फ़सल व बेलें। 
   
आओ!
राष्ट्रवाद का नगाड़ा बजाएँ, 
शून्य से मुद्दों को पैदाकर अखाड़ा बनाएँ।  
आओ!
नई पीढ़ी का भविष्य सँवारें,  
किंतु कैसे ?
परिष्कृत ज्ञान और दक्षता के लिये  
कब तक विदेश के पाँव पखारें ?
आओ!
राष्ट्रीय-चरित्र पर मंथन करें, 
कल के लिये आत्मावलोकन करें।   

#रवीन्द्र सिंह यादव  

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