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शनिवार, 31 मार्च 2018

क्रोध


मन में 

दशकों से 

दबे हुए 

क्रोध को 

आजकल 

सडकों पर 

भीड़ बनकर 

चाहतों के शहर 

ख़्वाबों की गलियाँ 

विध्वंस करते हुए 

निकाला जा रहा है।  

मनुष्य को ईश्वर ने 

औरों की पीड़ा महसूसने 

ज़मीर को जाग्रत रखने..... 

दिल दिया 

समझने सांसारिक-खेल  

जीवन को बेहतर बनाने 

दिमाग़ भी दे दिया 

फिर क्यों रख देता है 

मनुष्य 

अपना दिल-ओ-दिमाग़ 

गिरवी 

किसी धूर्त की चौखट पर.....?  

और पलभर में 

तत्पर हो जाता है 

अराजक दंगाई बनने। 

आम लोग होते हैं तबाह

किसी की होती है पौ-बारह   

घायलों, पीड़ितों की चीत्कार 

दिल की सूनी कोठरी में 

कभी तो सुनाई देगी 

तब तक 

बहुत देर हो चुकी होगी......!

# रवीन्द्र सिंह यादव 

मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

ख़ाकी

समाज को सुरक्षा का एहसास, 
क़ानून की अनुपालना के लिए  
मुकम्मल मुस्तैद मॉनीटर, 
मज़लूमों की इंसाफ़ की गुहार ,
हों गिरफ़्त में मुजरिम-गुनाहगार ,
हादसों में हाज़िर सरकार , 
ख़ाकी को दिया ,
सम्मान और प्यार ,
अफ़सोस कि इस रंग पर ,
रिश्वत ,क्रूरता ,बर्बरता,अमानवीयता,ग़ैर-वाजिब हिंसा ,
विवेकाधिकार का दंभ ,भेदभाव का चश्मा, काला पैसा ,
सत्ता के आगे आत्मसमर्पण ,
पूँजी की चौखट पर तर्पण,
ग़रीब फ़रियादी को दुत्कार ,
आसमां से ऊँचा अहंकार , 
मूल्यों-सिद्धांतों को तिलांजलि !
 दे दी शपथ को  भी   श्रद्धांजलि !!
इतने दाग़-धब्बों के साथ,
ख़ाक में मिल गये  हैं, 
ख़ाकी को मिले अलंकरण ..!!!!!!
यक़ीनन हो समर्पित 
जो किये हैं धारण 
ख़ाकी रंग हूबहू
   उन्हें शत-शत नमन।  

#रवीन्द्र सिंह यादव 

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