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शुक्रवार, 14 अप्रैल 2023

रोज़गार और नाम-पट्टिका

तुम्हारा शौक 

अब रोज़गार बन चुका है 

पत्थर की खदान का ठेका 

अपने आदमी को मिल चुका है 

पत्थर तराशे जा रहे हैं 

पहाड़ खोदे जा रहे हैं 

तुम्हारे नाम के अक्षर 

पत्थर पर खोदे जा रहे हैं

पत्थर चीख़ रहे हैं

फिर भी 

नई-नई नाम पट्टिकाओं के 

ऑर्डर बुक किए जा रहे हैं...  

© रवीन्द्र सिंह यादव   

बुधवार, 29 मार्च 2023

कट रहे हैं दिन

ह्रदय का असहज स्पंदन 

फूलों की गमक-सा 

बिखर गया है

पहाड़ कटने का क्रूर संगीत सुन 

बदन सिहर गया है  

स्मृतियों के खुरदरे फ़र्श पर 

इतिहास का पन्ना खुल गया है

गुमनाम आँसुओं की धार से धुलकर 

निरंकुश सत्ता का मुखौटा 

ख़ौफ़नाक हो गया है

विधि-विधान की लगाम 

किसको सौंप दी हमने

लाचारी की चादर ओढ़ 

लोक सारा सो गया है। 

© रवीन्द्र सिंह यादव   


रविवार, 26 फ़रवरी 2023

घोड़े की नाल

तुम्हें घोड़े को 

रथ में जोतना था 

तुम्हें उससे 

ताँगा खिंचवाना था

तुम्हें उस पर सवार हो 

युद्ध लड़ने  थे 

तुम्हें उस पर सवार हो 

पहाड़ चढ़ने थे 

तुम्हारे अपने शौक 

और विवशताएँ थीं 

घोड़े की अपनी 

क्या-क्या लालसाएँ थीं... 

ककरीली-पथरीली ज़मीन पर 

तेज़ रफ़्तार से दौड़ते-दौड़ते 

उसके खुर लहूलुहान न हों

तुम्हारे लक्ष्य में व्यवधान न हो  

तो तुमने ठोक दीं

या ठुकवा दीं  

लोहे की सख़्त नालें 

घोड़े के खुरों में! 

दर्दनाक!

और तुम ख़ुद को 

सभ्य कहते हो?

संवेदनशील होने का 

सुसज्जित ढोंग करते हो!

शर्मनाक!

© रवीन्द्र सिंह यादव 


रविवार, 17 जनवरी 2021

पहाड़ और विकास

उस शहर के पश्चिमी छोर पर 
 
एक पहाड़ को काटकर 

रेल पटरी निकाली गई 

नाम नैरो-गेज़ 

धुआँ छोड़ती 

छुकछुक करती 

रूकती-चलती छोटी रेल 

सस्ते में सफ़र कराती 

अविकसित इलाक़ों में जाती 

तीस साल उपरांत 

पुनः जाना हुआ 

न पटरी थी न पहाड़ के अर्द्धांश

न हरियाली न कलरव के अंश

न सँकरी पथरीली पगडंडी 

न चौकीदार की लाल-हरी झंडी   

विकास की तेज़ रफ़्तार 

एक पहाड़ लील गई 

पर्यावरणीय मुग्ध आशा 

मन में ही सील गई 

पहाड़ नीस्त-ओ-नाबूद करने से निकले 

पेड़,खंडे,बोल्डर,गिट्टी,मुरम,मिट्टी,चूरा

ज्यों शाश्वत से नश्वर हो गए हैं 

वे अब समायोजित हो गए हैं   

गलियों,सड़कों,रेल पटरियों,पुलों 
 
ख़ामोश आली-शान इमारतों में 

अपरिमित इंसानी भूख को करते-करते पूरा

उस पहाड़ ने लालची इंसान से

कुछ भी तो नहीं माँगा था 

वह तो अपनी युगों से बसाई बस्ती में भला-चंगा था  

उस दिन से अस्तित्त्वविहीन हुए पहाड़ की 

सिसकियाँ रोज़-रोज़ सुन रहा हूँ... 

प्राकृतिक असंतुलन की ज़ोरदार धमक 

रोज़-रोज़ सुनता ही जा रहा हूँ!

© रवीन्द्र सिंह यादव



शब्दार्थ / WORD MEANINGS 

1. नीस्त-ओ-नाबूद = नष्ट होना, समाप्त होना / DESTRUCTION 

2. अर्द्धांश = आधा अंश, आधा भाग / HALF  PART    

3. आली-शान = शानदार, भव्य / GLORIOUS   

4. शाश्वत = सदैव रहनेवाला, नष्ट न होनेवाला / PERPETUAL 

5. नश्वर = नष्ट होनेवाला, क्षणिक, मिटने योग्य / MORTAL  


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