जुदाई लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जुदाई लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

ख़िज़ाँ ने फिर अपना रुख़ क्यों मोड़ा है?




मिटकर मेहंदी को

रचते सबने देखा है,

उजड़कर मोहब्बत को

रंग लाते देखा है?


चमन में बहारों का

बस वक़्त थोड़ा है,

ख़िज़ाँ ने फिर अपना

रुख़ क्यों मोड़ा है?


ज़माने के सितम से

न छूटता दामन है,

जुदाई से बड़ा

भला कोई इम्तिहान है?


मज़बूरी के दायरों में

हसरतें दिन-रात पलीं,

मचलती उम्मीदें

कब क़दम मिलाकर चलीं? 


दुनिया में वफ़ा की आबरू है

साथ ख़ौफ़-ए-जफ़ा है,

ज़मीं-आसमां किसी बेआसरा से

क्यों इतना ख़फ़ा हैं?

© रवीन्द्र सिंह यादव

रविवार, 27 मई 2018

तीन क्षणिकाऐं

क्षणिकाऐं 


स्वप्न-महल  

बनते हैं महल 
सुन्दर सपनों के 
चुनकर 
उम्मीदों के 
नाज़ुक तिनके 
लाता है वक़्त 
बेरहम तूफ़ान 
जाते हैं बिखर 
तिनके-तिनके। 


सफ़र 

जीवन के 
लम्बे सफ़र में 
समझ लेता है 
दिल जिसे हमराही  
दो क़दम 
साथ चलकर 
बिछड़ जाते हैं 
बेड़ियाँ हालात की 
बनती हैं कब सवाली। 

जुदाई 

मिलन के लम्हात 
गुज़रे 
पहलू में बैठे-बैठे 
सुनते रहे 
बुलबुल की सदायें 
होंठों को दबाये-दबाये 
जब मिला 
जुदाई का ग़म 
मतलब-ए-उल्फ़त को 
समझ सके हैं हम।   
#रवीन्द्र सिंह यादव 

विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...