कविता!
तुम्हें फिर ज़िंदा होना होगा
घृणा का सागर पीने हेतु
प्रेम और वैमनस्य के बीच
बनना होगा पुनि-पुनि सेतु
पथराई संवेदना पर
बिछानी होगी
मख़मली मिट्टी की चादर
ओक लगाकर
पीना होगा
महासागर-सा अप्रिय अनादर
रोपने होंगे बीज सद्भाव के
सहेजने होंगे
किसलय-कलियाँ,कुसुम-पल्लव
मिटाने होंगे दाग़ नासूर-घाव के
कविता!
तुम्हें जीना ही होगा
मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए
प्रबुद्ध मानवता की संरचना के लिए!
© रवीन्द्र सिंह यादव
