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शनिवार, 1 जनवरी 2022

अमन का गीत मेरा खो गया है...

अमन का गीत 

मेरा खो गया है

देश का युवा चेहरा

पर कटे पंछी-सा  

गर्दिश में खो गया है

वो फ़ाख़्ता 

जो गुलिस्तां में 

ग़म-ख़ोर गीत गाती है 

उसका गला 

अब तो रुँध-रुँधकर 

थर्राकर भर्रा गया है

वो चित्रकार 

रंग, कूची; कल्पना के साथ 

बस बेबस खड़ा है 

हालात के नारों को 

सुन-सुनकर घबरा गया है

वाणी पर नियंत्रण 

क़लम पर पाबंदी 

मतभिन्नता की आज़ादी

अभिव्यक्ति के आयाम

सत्ता से तीखे सवाल पर 

लेखक का वजूद चरमरा गया

गाँधी की हत्या से 

सब्र नहीं जिन्हें 

वे अब रोज़-रोज़ 

चरित्रहत्या कर रहे हैं

यह कौन है 

जो शांत माहौल में

उकसावे का परचम लहरा गया?

© रवीन्द्र सिंह यादव       


बुधवार, 28 अगस्त 2019

पत्नी का दिया फ़ॉर्मूला कहता है...







कविवर विष्णु नागर जी के शब्दों में-

'पत्नी से बड़ा कोई आलोचक नहीं होता

उसके आगे नामवर सिंह तो क्या

रामचंद्र शुक्ल भी पानी भरते हैं

अब ये इनका सौभाग्य है

कि पत्नियों के ग्रंथ मौखिक होते हैं, कहीं छपते नहीं '


वहीं दूसरी ओर वे जीवन को कविता कहते हैं- 

'जीवन भी कविता बन सकता है

बस उसे लिखना आना चाहिए '


निष्पक्ष और सख़्त आलोचक

पत्नी जैसा हो  

आपके साथ हो  

तो निस्संदेह 

कविता नज़र आयेगी 

काव्य-कर्म के उत्तुंग शिखर पर

कविता में सामाजिक सरोकारों का 

सार्थक समावेश 

अन्याय का मुखर विरोध 

समूह की बर्बर तानाशाही का 

सक्षम सबल प्रतिरोध  

मनोरंजन की स्वीकार्य मर्यादा

ट्रोल से दूर रहने का सच्चा वादा  

किसी भी देश को जानने के लिये 

उस दौर के शासक को 

नहीं चाहेंगे लोग जानना 

साहित्य-कर्म के ज़रिए 

उचित है सृजनात्मक तारीख़ को 

वास्तविकता में जानना।                                                                                                                                 

कविता का कादम्बरी कद  

जीवन की कतिपय 

विद्रूपताओं-विसंगतियों के 

सहज समावेश से ऊँचा उठता है

प्रेमी / प्रेमिकाओं के साथ कविता  में 

संयोग और वियोग  शृंगार  के 

मानकों  की पराकाष्ठा उभरती है

शृंगार रस में पगी कविता 

दिल की गहराइयों में उतरती है।   


प्रेम में भाव गूँथने के लिये 

बहुतेरे शब्द ज़रूरी होते हैं

पाठक को सांगोपांग अनुभव कराने हेतु  

पत्नी का दिया फ़ॉर्मूला कहता है-

थोड़े में ज़्यादा कहो 

अपनी कालजयी कविता में 

सरोकार, स्वस्थ मनोरंजन, ज्ञान,

सामयिक सच और विचार भरो!

आत्मचेतस लेखक न बनो,

पीड़ित मानवता का दर्द लिखो!

सोये समाज का मर्म लिखो! 

व्यक्ति का महिमामंडन नहीं,

क़लम का स्वधर्म लिखो!

© रवीन्द्र सिंह यादव

सोमवार, 16 जनवरी 2017

मैं वर्तमान की बेटी हूँ



बीसवीं  सदी  में,

प्रेमचंद  की  निर्मला  थी   बेटी,

इक्कीसवीं  सदी   में,

नयना  / गुड़िया  या  निर्भया,

बन  चुकी   है   बेटी।


कुछ  नाम  याद   होंगे  आपको,

वैदिक  साहित्य   की  बेटियों  के-

सीता, सावित्री, अनुसुइया, उर्मिला ;

अहिल्या,     शबरी,    शकुंतला,

 गार्गी, मैत्रेयी, द्रौपदी या  राधा।


इतिहास  में

यशोधरा,  मीरा, रज़िया  या  लक्ष्मीबाई

साहित्य  में

सुभद्रा, महादेवी, शिवानी, इस्मत, अमृता,

 कृष्णा,  अरुंधति    या     महाश्वेता

  के   नाम  भी  याद  होंगे।


आज  चहुँओर   चर्चित  हैं-

सायना, सिंधु, साक्षी, सानिया ;

जहाँ    क़दम   रखती   हैं ,

छोड़   देती   हैं  निशानियाँ ।


घूँघट  से  निकलकर,

लड़ाकू-पायलट  बन  गयी  है  बेटी,

सायकिल  क्या  रेल-चालिका  भी  बन  गयी  है  बेटी,

अँतरिक्ष  हो  या  अंटार्टिका,

सागर   हो  या  हिमालय,

हो  मंगल  मिशन

या हो चुनौती भीषण,

अपना  परचम   लहरा   चुकी   है  बेटी,

क़लम   से   लेकर  तलवार  तक  उठा  चुकी  है  बेटी,

फिर   भी   सामाजिक  वर्जनाओं  की  बेड़ियों  में जकड़ी  है बेटी।


सृष्टि   की   सौन्दर्यवान   कृति  को,

परिवेश   दे  रहा   आघात   के   अमिट  चिह्न,

कौतुहलमिश्रित  वेदना   की  अनुभूति   से,

सजल   हैं    बेटी   के   सुकोमल   नयन,

हतप्रभ   है-

देख-सुन  समाज  की  सोच   का  चयन।



उलझा  हुआ   है  ज़माना,

अव्यक्त   पूर्वाग्रहों   में,

बेटी  के   माँ -बाप   को  डराते   हैं -

पुरुष   के  पाशविक, वहशी  अत्याचार ,

कुदृष्टि   में   निहित    अँधकार,

दहेज  से  लिपटे  समाज  के  कदाचार,

क़ानून  के  रखवाले   होते   लाचार ,

चरित्र-निर्माण  के  सूत्र   होते  बँटाधार,

भौतिकता   का   क्रूरतर   अम्बार।



बेटी   ख़ुद   को  कोसती   है,

विद्रोह   का  सोचती    है,

पुरुष-सत्ता  से  संचालित  संवेदनाविहीन  समाज  की,

विसंगतियों  के   मकड़जाल  से   हारकर,

अब  न लिखेगी   बेटी -

"अगले  जनम  मोहे   बिटिया  न  कीजो,

  मोहे    किसी    कुपात्र     को   न  दीजो।"


लज्जा, मर्यादा, संस्कार  की  बेड़ियाँ,

बंधन-भाव    की  नाज़ुक   कड़ियाँ,

अब  तोड़   दूँगी   मैं,

बहती   धारा   मोड़  दूँगी   मैं,

मूल्यों  की  नई  इबारत  रच  डालूँगी  मैं,

माँ   के  चरणों   में  आकाश   झुका   दूँगी ,

पिता   का  सर  फ़ख़्र   से  ऊँचा  उठा  दूँगी,

मुझे  जीने   दो   संसार   में,

अपनों  के  प्यार-दुलार  में,

मैं   बेटी   हूँ   वर्तमान   की!

मैं  बेटी   हूँ   हिंदुस्तान   की!!

 © रवीन्द्र सिंह यादव 


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