सिंधु तट लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सिंधु तट लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

बालू पर लिखा था एक नाम

सिंधु तट पर 

एक सिंदूरी शाम 

गुज़र रही थी

थी बड़ी सुहावनी  

लगता था 

भानु डूब जाएगा 

अकूत जलराशि में 

चलते-चलते 

बालू पर पसरने का 

मन हुआ 

भुरभुरी बालू पर 

दाहिने हाथ की 

तर्जनी से 

एक नाम लिखा 

सिंधु की दहाडतीं 

प्रचंड लहरें 

अपनी ओर आते देख 

तत्परता से लौट आया 

अगली भोर फिर गया 

सुखद अचरज से देखा 

एक घोंघा 

वही नाम 

बालू पर लिख रहा था... 

© रवीन्द्र सिंह यादव


विशिष्ट पोस्ट

नागरिक और सत्ता

सत्ता का रूप  वीभत्स हो उठता है  जब उसके हो जाते हैं  नुकीले दाँत  पैने-लंबे पंजों के नाख़ुन  आँखों से विलुप्त शील  ह्रदय में बैठ जाती है  स्...