धीरे - धीरे ज़ख़्म सारे
अब भरने को आ गए ,
एक बेचारा दाग़ -ए -दिल है
जिसको ग़म ही भा गए।
ज़िन्दगी को जब ज़रूरत
उजियारे दिन की आ पड़ी,
लपलपायीं बिजलियाँ
गरजकर काले बादल छा गए।
एक बेचारा दाग़ -ए -दिल है
जिसको ग़म ही भा गए।
बाँसुरी की धुन पे थिरका
बृज के साथ सारा ज़माना,
श्याम जब राधा से मिलने
यमुना तट पर आ गए।
एक बेचारा दाग़ -ए -दिल है
जिसको ग़म ही भा गए।
आज फिर आँगन में मेरे
नन्हीं कलियाँ खिल रहीं,
गीत फिर इनको सुनाओ
जो दादी नाना गा गए।
एक बेचारा दाग़ -ए -दिल है
जिसको ग़म ही भा गए।
क्या मनाएं जश्न हम
ज़िन्दगी की जीत का,
बाँटने को थीं जो चीज़ें
हम उन्हीं को खा गए।
एक बेचारा दाग़ -ए -दिल है
जिसको ग़म ही भा गए।
इस रचना को सस्वर सुनने के लिए लिंक - https://youtu.be/QdAzRuiZa8