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रविवार, 11 जनवरी 2026

मानव और प्रकृति

चित्र:महेन्द्र सिंह 

तुम भला क्यों अजनबी हो जाना चाहते हो?

एक मौसम-चक्र परिपूर्ण होते-होते 

कितना कुछ है जो बदल जाता है प्रकृति में 

कली से फूल 

फूल में बीज 

बीजों से फिर नये पौधे 

देखो राह की मिट्टी को 

वर्षा में घुल गयी 

महक बिखेरकर धुल गयी 

हो जब सर्द मौसम की सुहानी धूप 

पर्वतों पर प्रकृति सँवारती है रूप 

नियति-क्रम में हरेक पल 

एक-दूसरे से अजनबी ही तो है...

प्रकृति की सर्वोत्तम कृति 

यानी मानव 

माप-गिन रहा है दूरी,दोष,समय,सामान

व्याकुल है कि लोग कैसे रहें परेशान। 

©रवीन्द्र सिंह यादव 


बुधवार, 28 फ़रवरी 2024

मूल्यविहीन जीवन

चित्र: महेन्द्र सिंह 


अहंकारी क्षुद्रताएँ 

कितनी वाचाल हो गई हैं 

नैतिकता को 

रसातल में ठेले जा रही हैं

 मूल्यविहीन जीवन जीने को 

उत्सुक होता समाज 

अपने लिए काँटे बो रहा है

अथवा फूल

यह तो समय देखेगा 

पीढ़ियों को कष्ट भोगते हुए

मूल्यविहीनता का क़र्ज़ उतारते हुए।  

©रवीन्द्र सिंह यादव

मंगलवार, 1 सितंबर 2020

मधु,मानव और मधुमक्खियाँ

परागरहित चंपा पुष्प

उपेक्षित भाव की 


पीड़ा से गुज़रता है

जब मधुमक्खियाँ

उससे किनारा कर जातीं हैं

पराग चूसने

नीम के फूलों तक चलीं जातीं हैं

पराग देकर

फूल खिल जाते हैं

फूल होने पर इठलाते हैं

मानव-ज़ात को

शहद का छत्ता देकर

मधुमक्खियाँ 


अतिशय आनंद से 

आप्लावित हो चहकतीं हैं

वे आशान्वित रहतीं हैं

वे जानतीं हैं

उनका श्रम-ज्ञान ज़ाया नहीं होगा

अनेक फूलों से 


संग्रहित हुए पराग से 

निर्मित निर्मल मधु

उस मानव में बसी 


कलुषता मिटाएगा

जो मानव-मानव में भेद करता है

किसी न किसी फूल का पावन पराग

उसकी जिव्हा से मस्तिष्क तक


ह्रदय से रग-रग तक

पवित्र विचारों की

मिठास घोलेगा


मन-बुद्धि-संस्कार के 

सँकरे रास्ते खोलेगा

और वह एक दिन

प्रकृति को धन्यवाद बोलेगा। 


© रवीन्द्र सिंह यादव 

बुधवार, 14 अगस्त 2019

सुनो प्रिये !


सुनो प्रिये !

मैं बहुत नाराज़ हूँ आपसे

आपने आज फिर भेज दिये

चार लाल गुलाब के सुंदर फूल

प्यारे कोमल सुप्रभात संदेश के साथ

माना कि ये वर्चुअल हैं / नक़ली हैं 

लेकिन इनमें समाया

प्यार का एहसास / महक तो असली है

नादाँ हूँ / प्रकृतिप्रेमी हूँ  / कवि हूँ

कदाचित मुझे ये फूल असली लगते हैं 

आपकी साइंटिफ़िक समझ का क़ाएल हूँ 

ये चार फूल हृदय के चारों चेम्बर्स के लिये- 

Two atria and two ventricles.

 1. Right Atrium 

   2. Right Ventricle 

3. Left Ventricle 

4. Left Atrium 




नज़र सोख लेती है प्यारे गुलाब में 

लिपटे पुरकशिश पुरनूर जज़्बात  

सच कहूँ एक फूल ही काफ़ी है

ख़ून में घुलकर ऑक्सीजन के साथ 

तन के पोर-पोर में प्यार महकाने के लिये 

अब मेरी छेड़ की बात सुनो!

रोज़ रखती रहना

सुप्रभात संदेश आबा-जाही में  

सिर्फ़ एक लाल गुलाब का फूल 

नहीं तो मौक़ा पाकर  

कोई रख न दे दिल में 

नये तरह का आकर्षक फूल 

और जब वो नागफनी बनकर 

फैलेगा नुकीले काँटों के साथ 

तो दिल के सभी चेम्बर्स में चुभेगा

मख़मली नाज़ुक एहसासात को 


बेरहमी से लहूलुहान करेगा  

तब बहुत याद आयेगी आपकी 

मत भूलना सिर्फ़ एक फूल रोज़!

सिर्फ़ एक Red Rose!! 

काश! ये तीन शेष फूल 


कहीं और भी जाकर 


प्यार को महकाते 


तो तीन और प्यारभरे दिल 


मेरे देश में बढ़ते! 


नफ़रतों के तूफ़ान से 


शिद्दत के साथ लड़ते!


जय हिंद !


© रवीन्द्र सिंह यादव

बुधवार, 29 नवंबर 2017

एक नाज़ुक-सा फूल गुलाब का ...




हूँ  मैं  एक  नाज़ुक-सा  फूल, 
घेरे रहते हैं मुझे नुकीले शूल। 

कोई तोड़ता पुष्पासन से, 
कोई तोड़ता बस पँखुड़ी; 
पुष्पवृंत से तोड़ता कोई, 
कोई मारता बेरहम छड़ी।   

खोंसता गेसुओं में महबूब के कोई तोड़कर, 
बिछा देता है कोई कुपात्र के क़दमों पर; 
अर्पित  करता  है  कोई  ईष्ट  के  सर, 
बिलखता हूँ मैं भी किसी के मरने पर। 

मिट जाता हूँ ख़ुशी-ख़ुशी, 
बेहिचक औरों की ख़ुशी के लिये;  
बनता है इत्र, गुलकंद, गुलाब-जल,
 ज़माने की ख़ुशी के लिये।  

मन-मस्तिष्क,नज़र और दिल, 
सब पर मेरा ही राज  है; 
मकरंद मेरा मधुमख्खियों को, 
लगता मदिर मधुर साज़ है; 

ले जाती हैं चूसकर वे बूँद-बूँद,
क़रीने से एक छत्ता बनाने; 
मधु  की मधुरिम मिठास, 
मतलबी संसार को चखाने।   

छत्ते का मधुमय मोम,
  लिपस्टिक में मिलकर; 
खेलता है अठखेलियाँ,
  गोरी के गुलाबी लबों पर।  

भीनी ख़ुशबू में तर-ब-तर  होकर, 
मीठे बोल फ़ज़ाओं में अदब से उतरते हैं; 
मोहक मधुर सदाएँ सुन आबोहवा की
लगता है बस्ती को ज्यों होंठों से फूल झरते हैं।  


आशिक़-महबूबा की गुफ़्तुगू सुनता हूँ, 
गुलशन में इश्क़ के सौदे रोज़ बुनता  हूँ; 
शर्म-ओ-हया, यक़ीन,वफ़ा, इक़रार सब ज़िक्र हुए, 
रेशमी मरमरी ख़्वाबों के चर्चे सरेआम बेफ़िक्र हुए।  

अकेला आता है कोई दिलजला, 
तब  महसूसता हूँ धधकते शोलों की तीव्र तपन;
दिल की बाज़ी हारकर, 
सुना जाता है अपने सीने की चुभन-जलन।   

तितलियाँ,ततैया,भँवरे,मधुमख्खियाँ,कीट-पतंगे,
 आते रहते  मधुवन में  मुझसे मिलने 
होंगे इनके अपने-अपने माक़ूल मक़सद,
  संपन्न होता है परागण पीढ़ियां संसार में बढ़ने ; 

मृत्यु के भावी भय से परे,
 औरों के लिये मुस्कराते हैं फूल; 
मुरझाने की आसन्न नियति से,
 कदापि नहीं घबराते हैं फूल।  

ज़माना माने तो माने उन्हें बेवफ़ा, 
मैं कैसे मानूँ  उन्हें अलग-थलग; 
ब्रेक-अप के बाद तन्हा आए, 
मजबूरियाँ  बताने अलग-अलग। 

वफ़ा का चराग़ रहेगा रौशन, 
देखी है ललक मैंने उन आँखों में;  
जज़्बात की पाकीज़गी,
बिछा देगी फूल ही फूल राहों में।   

 © रवीन्द्र सिंह यादव 




शब्दार्थ / WORD MEANINGS 


नाज़ुक = अत्यंत कोमल,विनम्र,विनीत / DELICATE
शूल = काँटा ,कंटक / THORN 


पुष्पासन = फूल का निचला भाग जहाँ सभी भाग इससे जुड़े होते हैं इस  पर टिककर फूल खिलता /  RECEPTACLE 


पुष्पवृंत = डंठल जिससे फूल और डाली जुड़े होते हैं / STALK OF A  FLOWER 


पंखुड़ी = पाँख ,दल / PEPAL 


छड़ी =  STICK 


इत्र = ख़ुशबूदार तरल / PERFUME, ESSENCE , SCENT 


गुलकंद = सूखे गुलाब की पंखुड़ियों को पानी में शक्कर के साथ गर्म करके बना  मिठासभरा गाढ़ा उत्पाद  / CONSERVE OF ROSE PETALS


मकरंद = पराग, पुष्परस  / NECTOR 

माक़ूल= उचित, उपयुक्त / REASONABLE, APPROPRIATE 


मोम= मधुमख्खियों  के छत्ते का सम्पूर्ण स्पंजनुमा भाग जोकि उत्कृष्ट गुणवत्ता की लिप स्टिक बनाने में उपयोगी है / NATURAL WAX 


परागण (POLLINATION ) = फूलों में प्रजनन की प्रक्रिया जिसमें STAMEN (POLLEN GRAINS ) को एक फूल से दूसरे फूल या उसी फूल में STIGMA तक  पहुँचाने में कीट-पतंगों ,तितलियों आदि का महत्वपूर्ण योगदान होता है।  

लिपस्टिक (Lipstick ) = एक सौंदर्य प्रसाधन उत्पाद जोकि अधरों की सुंदरता में नयनाभिराम आकर्षण उत्पन्न कर सके।  इसमें त्वचा सम्बंधी नमी बरक़रार रखने वाले तत्व , तेल , मोम (Wax) और रंगों का इस्तेमाल किया जाता है।  वास्तव में इस उत्पाद में सभी तत्व नैसर्गिक (Natural ) होने चाहिए ( यहां उल्लेखनीय है शहद के छत्ते से प्राप्त मोम / WAX  का लिपस्टिक बनाने में  प्रयोग होता है  ) किन्तु आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमें अब इतना भी भान नहीं है कि बाज़ार ने इसमें कौन-कौन से हानिकारक रसायन मिला दिए हैं जिसका खामियाज़ा सीधा ग़रीब वर्ग उठाता है क्योंकि प्राकृतिक तत्वों के साथ तैयार की हुई लिपस्टिक ख़रीदने की उसकी हैसियत नहीं है लेकिन इस शौक को भी पूरा करना है तो बाज़ार ने सस्ता से सस्ता हानिकारक विकल्प उपलब्ध करा दिया है।  

हमारी मानसिकता भी अरबों के व्यवसाय का आधार बन जाती है। 

मेक अप ( Make up ) अर्थात क्षतिपूर्ति।  जो कमी है उसे पूरा किया जाना।  फ़ैशन का क्रम ऊपर से नीचे की ओर बढ़ता है।  पहले इसे आभिजात्य वर्ग अपनाता है फिर समाज में नीचे की ओर इसका अंधानुकरण फैलता चला जाता है। 


लब (Lip ) = होंठ , ओष्ठ , अधर 

प्राकृतिक रूप से स्वस्थ  होंठों का रंग गुलाबी ही होता है ख़ून की कमी के कारण या अन्य कारणों से इनका रंग काला या नीला भी देखा जाता है।  आजकल फ़ैशन का ऐसा रंग चढ़ा है कि बाज़ार ने मानसिकता पर कब्ज़ा कर लिया है और लिपस्टिक  काले , हरे और न जाने कितने रंगों में उपलब्ध होकर अधरों पर सज रही है; परिधान के रंगों से मैच करती हुई। 

श्रृंगार रस के कवियों ने अधरों का वर्णन करने में कोई कोताही नहीं की है। गीतकार राजेंद्र कृष्ण जी ने   फ़िल्म शहनाई के  एक गीत   "न झटको ज़ुल्फ़ से पानी" .......  में पढ़िए कितनी कलात्मकता प्रदर्शित की है।  आगे ख़ूबसूरत प्रतीकों का इस्तेमाल करते हुए कहा है -
"ये नाज़ुक लब हैं या आपस में दो लिपटी हुई कलियाँ.....
   ज़रा  इनको   अलग  कर  दो  तरन्नुम  फूट  जाएंगे।" 

सोमवार, 23 अक्टूबर 2017

ख़्यालों का सफ़र

अल्फ़ाज़ है कुछ माज़ी के 

दिल कभी भूलता ही नहीं

नये-पुराने घाव भर गए सारे  

दर्द-ओ-ग़म राह ढूँढ़ता ही नहीं। 



उम्र भर साथ चलने का वादा है 

अभी से लड़खड़ा गए हो क्यों ?

प्यास बुझती कहां है समुंदर-ए-इश्क़ में 

साहिल पे आज आ गए हो क्यों ?



गर  न  हों  फ़ासले  दिल में   

तो दूरियों की परवाह किसे

नग़मा-ऐ-वफ़ा गुनगुनाती हो धड़कन

तो सानेहों की परवाह किसे। 



सबके अपने-अपने क़िस्से 

अपने-अपने  मेआर हैं 

रंग  बदलते  ज़माने  के 

हम  भी  एक  क़िरदार हैं। 



छूकर फूल को महसूस हुआ 

हाथ आपका जैसे छुआ हो 

रूह यों जगमग रौशन हुई

ज्यों रात से सबेरा हुआ हो। 

#रवीन्द्र सिंह यादव     

शब्दार्थ / WORD MEANINGS 
अल्फ़ाज़ = शब्द, शब्द समूह  ( लफ़्ज़ का बहुवचन ) / WORDS 

माज़ी = अतीत ,भूतकाल / PAST 

दर्द-ओ-ग़म= दर्द और ग़म / PAIN AND SORROW 

साहिल =समुद्री किनारा / SEA SHORE ,COAST  

फ़ासले = दूरी / DISTANCE 

सानेहों = त्रासदी (त्रासदियों ) / TRAGEDIES 

मेआर= मानक / Standard , Yardsticks 

रूह= आत्मा / SOUL ,SPIRIT 


मंगलवार, 10 जनवरी 2017

फूल से नाराज़ होकर तितली सो गयी है



फूल   से  नाराज़   होकर

तितली    सो      गयी     है,

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(1 )




हो   चला   सयाना    फूल  

ज़माने   के    साथ-साथ ,

मुरझाई    हैं    पाँखें  

महक   भी    रो    गयी  है।

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(2  )





नसीहत  अब  कोई

हलक़   से  नीचे  जाती   नहीं,

दिल्लगी   की   प्यारी  खनक

अब   हमसे   खो  गयी   है।

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(3  )





आशियाँ    दिलक़श   बने

जो    तेरी   शोख़ियाँ  हों,

ताज़ा  हवा  आँगन  में

बीज-ए -ख़ुलूस  बो  गयी  है।

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(4 )





यादों   के   आग़ोश   में

बैठा   हुआ  है  बोझिल  दिल,

एक   मुलाक़ात  मैल  मन  का

मनभर   धो     गयी    है।

बंद   कमरों   की  अब

ऐसी  हालत   हो   गयी   है।.........(5 )


 @रवीन्द्र  सिंह  यादव






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जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...