कुछ लोग इसे
उजाला कह रह हैं
शायद उन्होंने
उजाले की परिभाषा
बरबस बदल दी है
मुझे तो स्याह तमस में
बस जुगनुओं की
दीवानगी नज़र आती है
न्याय जब पहले से तय हो
तो अर्जित कमाई
बीवी के ज़ेवर
बच्चों की ख़ुशियाँ और समय
खोना क्यों ?
चुना जब कंटकाकीर्ण पथ
तो ज़ख़्मों पर रोना क्यों?
घुटन का दरिया
अकुलाहट का तूफ़ान
प्रतीक्षा के दामन में
घड़ियाँ गिन रहा है
शबनम में नहाई दूब पर
बेधड़क चलने का हक
किसी का छिन रहा है।
© रवीन्द्र सिंह यादव