ज़ेवर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ज़ेवर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 27 सितंबर 2020

घुटन का दरिया

 कुछ लोग इसे 

उजाला कह रह हैं 

शायद उन्होंने 

उजाले की परिभाषा 

बरबस बदल दी है 

मुझे तो स्याह तमस में 

बस जुगनुओं की 

दीवानगी नज़र आती है

न्याय जब पहले से तय हो 

तो अर्जित कमाई 

बीवी के ज़ेवर 

बच्चों की ख़ुशियाँ और समय  

खोना क्यों ?

चुना जब कंटकाकीर्ण पथ 

तो ज़ख़्मों पर रोना क्यों?

घुटन का दरिया 

अकुलाहट का तूफ़ान 

प्रतीक्षा के दामन में 

घड़ियाँ गिन रहा है

शबनम में नहाई दूब पर 

बेधड़क चलने का हक 

किसी का छिन रहा है। 

© रवीन्द्र सिंह यादव


विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...