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शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2023

भीड़

पढ़ा होगा आपने कभी 

नीड़ का निर्माण 

अब पढ़ते रहिए 

भीड़ का निर्माण 

मनोवैज्ञानिक

समाजशास्त्री 

करते रहे शोध 

भीड़ के चरित्र पर 

राजनीति ने लाद दी 

अपनी मनोकामनाएँ भीड़ पर

अंतर में छाए अँधेरों में 

उभरते हैं बिंब लिए उन्मादी उमंगें  

साझा सहमति से उभरती हैं 

विनाश की तीखी तीव्र तरंगें

या किसी और के द्वारा तय 

लक्ष्य की ओर 

मुड़ जाती है भीड़...

क्योंकि 

भीड़ का कोई धर्म नहीं होता 

बुध्दि, विवेक, मर्म नहीं होता।      

©रवीन्द्र सिंह यादव

रविवार, 24 जनवरी 2021

भीड़ को तो बस इशारा चाहिए!


धुंध में धूमिल हैं दिशाएँ

सीखे-पढ़े को क्या सिखाएँ

विकराल विध्वंस की सामर्थ्य 

समाई उँगलियों में

सघन कुहाँसे से 

फिर-फिर लड़ा जाएगा 

रवि रोपता जा रहा है विचार 

अपनी उज्जवल रश्मियों में

भीड़ के जयकारे 

उत्साह उमंग नहीं 

व्यस्त हैं भय उगलने में

रौंद डालने को आतुर है 

तुम्हारा स्थान 

केन्द्र हो या हाशिए  

भीड़ को तो बस इशारा चाहिए!

© रवीन्द्र सिंह यादव

 

शुक्रवार, 12 जून 2020

करोना-काल में लाशें

जीते-जीते 

जीवन-शैली विकसित हुई 

शव को सम्मान 

मिलने की बात तय हुई 

आज करोना-काल में 

सघन या छितराई 

लाशों की भीड़ 

तलाश रही है 

अंत्येष्टि की गरिमा से भरा नीड़

भीड़ की भरमार में 

लकवाग्रस्त तंत्र 

भेज रहा है 

एक ही घर में 

एक ही व्यक्ति की 

दो-दो बार लाशें!

कोई भटक रहा है 

कई-कई दिन  

लेने अपनों की लाशें 

लाशों का हिसाब 

बार-बार बिगड़ रहा है 

कोई दफ़्तर-दफ़्तर 

एड़ियाँ रगड़ रहा है

कहीं दाह-क्रिया / दफ़नाने का 

उपेक्षित सरकारी रबैया

कहीं अविश्वास की नाव में  

बैठे हैं यात्री और खिबैया  

कचरा-गाड़ी पर शव...!

यह कैसा वक़्त का विप्लव!  

करोना-योद्धाओं का कैसा 

चिंतनीय विभव-पराभव

कुछ तो भर चुके हैं 

ग़ुस्से से लबालब

वर्जनीय-ग्रहणीय निर्देशों के बवंडर

बढ़ा रहे हैं रोज़-रोज़ संशय और डर

देख-सुन करोना महामारी का 

कसता शिकंजा     

हृदय कचोट रहा है

कोई निर्मम ऐसा भी है 

जो धन लूट-खसोट रहा है

दुनियाभर में लाशों की दुर्दशा के 

हृदयविदारक समाचार

कब तक देखेंगीं आँखें बार-बार?

एक अदृश्य दुश्मन से 

भयातुर है भीरु इंसानी दुनिया 

मास्क मुँह पर हाथों में दस्ताने

अनचीह्नी-सी हो गई है 

करोना-काल की दुनिया

बदली आब-ओ-हवा में 

नया रण-क्षेत्र हो गई है दुनिया।    

© रवीन्द्र सिंह यादव

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020

हाइकु

 1. 
जलती बस्ती~ 
खड़ा है लावारिस 
संतरा-ठेला। 

2. 
दंगे में तख़्ती~ 
एक सौ पचास है 
दूध का भाव। 

3. 
संध्या की लाली~
क्षत-विक्षत लाश 
चौपाल पर। 

4. 
अर्द्ध-यामिनी~ 
जलते घरोंदों में 
इंसानी शव। 

5. 
भोर की लाली~ 
गली में ईंट-रोड़े  
भीड़ के हाथ।  
 
© रवीन्द्र सिंह यादव 

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जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...