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रविवार, 11 जुलाई 2021

ऑक्सीजन और दीया

उमसभरी दोपहरी गुज़री 

शाम ढलते-ढलते 

हवा की तासीर बदली 

ज्यों आसपास बरसी हो बदली

ध्यान पर बैठने का नियत समय 

बिजली गुल हुई आज असमय 

मिट्टी का दीया 

सरसों का तेल 

रुई की बाती

माचिस की तीली

उत्सुक मुनिया के नन्हे हाथ  

सबने मिलकर जलाई ज्योति पीली 

सरसराती शीतल पवन बही 

दीये की लौ फरफराती रही 

हवा से जूझती रही लौ 

दिल की धड़कन हुई सौ 

ध्यान लौ पर हुआ केन्द्रित 

आई माटी की गंध सुगंधित 

दीया ढक दिया काँच के गिलास से 

दीया जलता रहा हुलास से

अनुकूल समय बीत रहा था 

दीये का दम घुट रहा था 

अचानक घुप्प अँधेरा 

मैंने मुनिया को टेरा 

मोबाइल-टॉर्च जली तो देखा 

दीये में तेल भी बाती भी...भाल पर संशय की रेखा 

निष्कर्ष के साथ मुनिया बोली-

"ऑक्सीजन ख़त्म होने से बुझ गया है चराग़।" 

मेरे ह्रदय ने सुना विज्ञान का नीरस राग। 

©रवीन्द्र सिंह यादव 


रविवार, 3 मई 2020

वह बिजली से चलनेवाली ट्रैन

ज्ञात नहीं 

अब कहाँ हो तुम

मैं आज भी हूँ 

उसी स्मृति में गुम 

जब तुम्हें सी ऑफ़ करने

तीन मई नवासी

इकत्तीस साल पूर्व    

रेलवे स्टेशन पर 

प्लेटफ़ॉर्म चार पर 

उस ट्रैन में बैठाया था 

जो ले गयी तुम्हें 

मुझसे बहुत दूर 

वह बिजली से चलनेवाली ट्रैन 

लगी थी बड़ी क्रूर 

बस तुम्हारी झुकीं पलकें 

जादुई मुस्कुराहट

मड़राती रहती है 

आज भी मेरे आसपास दिन-रैन

 ट्रैन की खिड़की से 

निहारता मासूम मुखड़ा ले   

तीव्र गति से ओझल हो गई थी 

तुम्हें मुझसे सुदूर ले जाती   

वह लाल रंग की ट्रैन!

जो आज भी सरसराती हुई 

चल रही है मेरे ज़ेहन में

यादों की ट्रैन दौड़ रही है

नॉस्टाल्जिआ की पटरियों पर

बेधड़क धड़धड़ाती हुई 

शुक्र है कि वह बुलेट ट्रैन नहीं थी।     

© रवीन्द्र सिंह यादव

बुधवार, 21 दिसंबर 2016

बादल आवारा


आवारा     बादल    हूँ     मैं
अपने  झुंड  से  बिछड़  गया  हूँ   मैं
भटकन   निरुद्देश्य   न  हो
इस  उलझन  में  सिमट  गया  हूँ   मैं।


सूरज  की  तपिश  से  बना   हूँ   मैं
धनात्मक  हूँ   या  ऋणात्मक  हूँ  मैं
इस ज्ञान  से  अनभिज्ञ  हूँ    मैं
बादलों   के  ध्रुवीकरण
और  टकराव  की  नियति   से   
छिटक    गया  हूँ   मैं
बिजली  और  गड़गड़ाहट से  
बिदक  गया   हूँ   मैं।


सीमेंट-सरिया   के   जंगल   से   दूर
उस  बस्ती  में   बरसना   चाहता  हूँ    मैं
जहाँ...

जल  की  आस   में
दीनू   का  खेत  सूखा  है  
रोटी   के   इंतज़ार   में  
नन्हीं   मुनिया  का  पेट  भूखा   है  
लहलहाती  फ़सलों  को
निहारने  सुखिया  की आँखें   पथरायीं  हैं
सीमा   पर  डटे  पिया   की  बाट   जोहती
सजनी की निगाहें  उदास  दर्पण से टकरायीं हैं
गलियों   में  बहते  मटमैले  पानी  में
बचपन  छप-छप  करने   को  आकुल  है  
अल्हड़  गोरी  हमउम्र सखियों  संग
झूले पर  गीत  गाने  को  व्याकुल  है।    


माटी  की  भीनीं-सौंधी  गंध
हवा   में   बिखर    जायेगी  
हरियाली   की  चादर   ओढ़  
पुलकित   बसुधा   लजायेगी 
नफ़रत  बहेगी नालों में
सद्भाव   उगेंगे   ख़यालों में। 


उगे  हैं  बंध्या-धरती   पर  शूल   जहाँ
पुष्पित  होंगे   रंग-बिरंगे  फूल   वहाँ
सूखे    कंठ   जब   तर-ब-तर   होंगे
अनंत   आशीष    मेरे    सर    होंगे।


यह  दृश्य   देख  
बादल  होने  पर   इतराऊँगा  
काल-चक्र    ने  चाहा   तो
फिर  बरसने  आऊँगा........!!!

#रवीन्द्र सिंह यादव 


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