प्रभात अच्छे अंकों से पाँचवीं कक्षा में उत्तीर्ण हुआ। माँ अँग्रेज़ी माध्यम के निजी विद्यालय में आगे की पढ़ाई पर ज़ोर डालते हुए बोली-
"अब मेरा बिटवा और अधिक मन लगाकर पढ़ेगा। पढ़-लिखकर गुरूजी बनेगा।"
"लेकिन अँग्रेज़ी माध्यम के विद्यालय का शुल्क वहन करने की हमारी क्षमता नहीं है। अभी तो नगर पालिका के पुराने विद्यालय में ही पढ़ने दो, दीनानाथ जी मेरे मित्र हैं तो प्रवेश आसानी से मिल जाएगा और छात्रवृत्ति भी।"
कृष्णपाल ने कांता को समझाया।
प्रभात पीठ पर भारी बस्ता लादे हड़बड़ी में दौड़ जाता है। माँ द्वारे से पुकारती हुई रुकने को कहती हुई उसके पीछे-पीछे सरपट चली आती है।
"यह काला टीका कुदृष्टि से बचाता है, कुछ पल और रुक जाता तो क्या होता? आज बिना टीका लगवाए ही भाग पड़ा।"
कांता ने पीठ पर हौले से धौल जमाते हुए संतोष के स्वर में कहा।
"जाओ वहाँ मुर्गा बन जाओ! तुम तो कभी देर से नहीं आते थे आज समय से तीन मिनट पीछे..."
अध्यापक जी ने झल्लाते हुए लगातार बरसात से गीले हुए मैदान की ओर इशारा किया।
मुर्गा बने हुए सात-आठ मिनट बीत गए। प्रभात की पिड़लिओं,ग्रीवा और रीढ़ की हड्डी में दर्द उभर आया। तभी सन्नाटे को तोड़ता तीव्र धमाका हुआ। प्रभात चौंककर खड़ा होकर देखता है, उसकी कक्षा के जर्जर कमरे की छत,दीवारें सब धड़ाम! माहौल चीख़-पुकार,चीत्कार से डरावना हो गया। सहायता के लिए वह भी मलवे की ओर दौड़ पड़ा।
© रवीन्द्र सिंह यादव
"अब मेरा बिटवा और अधिक मन लगाकर पढ़ेगा। पढ़-लिखकर गुरूजी बनेगा।"
"लेकिन अँग्रेज़ी माध्यम के विद्यालय का शुल्क वहन करने की हमारी क्षमता नहीं है। अभी तो नगर पालिका के पुराने विद्यालय में ही पढ़ने दो, दीनानाथ जी मेरे मित्र हैं तो प्रवेश आसानी से मिल जाएगा और छात्रवृत्ति भी।"
कृष्णपाल ने कांता को समझाया।
प्रभात पीठ पर भारी बस्ता लादे हड़बड़ी में दौड़ जाता है। माँ द्वारे से पुकारती हुई रुकने को कहती हुई उसके पीछे-पीछे सरपट चली आती है।
"यह काला टीका कुदृष्टि से बचाता है, कुछ पल और रुक जाता तो क्या होता? आज बिना टीका लगवाए ही भाग पड़ा।"
कांता ने पीठ पर हौले से धौल जमाते हुए संतोष के स्वर में कहा।
"जाओ वहाँ मुर्गा बन जाओ! तुम तो कभी देर से नहीं आते थे आज समय से तीन मिनट पीछे..."
अध्यापक जी ने झल्लाते हुए लगातार बरसात से गीले हुए मैदान की ओर इशारा किया।
मुर्गा बने हुए सात-आठ मिनट बीत गए। प्रभात की पिड़लिओं,ग्रीवा और रीढ़ की हड्डी में दर्द उभर आया। तभी सन्नाटे को तोड़ता तीव्र धमाका हुआ। प्रभात चौंककर खड़ा होकर देखता है, उसकी कक्षा के जर्जर कमरे की छत,दीवारें सब धड़ाम! माहौल चीख़-पुकार,चीत्कार से डरावना हो गया। सहायता के लिए वह भी मलवे की ओर दौड़ पड़ा।
© रवीन्द्र सिंह यादव