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बुधवार, 1 अक्टूबर 2025

युद्ध और भूख

हम जानते हैं 

दुनिया में भूख का साम्राज्य 

युद्दों की देन है 

फिर भी कुछ खाए-पिए-अघाए 

युद्द कैसे हों 

इस रणनीति पर 

सोचते दिन-रैन हैं

पसरते पूँजी के पाँवों तले 

दब गई है चीत्कार भूखों की 

अब नहीं टोकती 

प्रबुद्ध मानवता 

युद्धोन्माद में डूबे दिमाग़ों को

विकृत सोच के हवाले  

छोड़ दिया है दुनिया को!

©रवीन्द्र सिंह यादव 


शनिवार, 19 जुलाई 2025

साँचा

मूल्य

संवेदना

संस्कार 

आशाएँ 

आकांक्षाएँ

एकत्र होती हैं 

एक सख़्त साँचे में 

ढलता है 

एक व्यक्तित्त्व

उम्मीदों के बिना भी 

जीते जाने के लिए

दुनिया के ज़ख़्मों पर 

नेह का लेप लगाने के लिए

यह सहज साँचा 

हमने अब खो दिया है 

भौतिकता के अंबार में 

बहुत नीचे दब गया है।   

©रवीन्द्र सिंह यादव 

 

शुक्रवार, 19 मार्च 2021

विकास और भारत


याद करो 

पिछले पचास वर्ष 

हम 

इतने स्वकेन्द्रित तो नहीं थे

मानसिकता के धरातल पर 

जहाँ आज हैं 

तब इतने तो नहीं थे  

दुनिया 

विकास करती रही

परमाणु बम बनाने की 

अंधी दौड़ चलती रही 

भौतिकता के विस्तार में

संवेदनाविहीन हुई

व्यक्ति की पाशविक कुंठा 

उत्तरोत्तर विकसित हुई 

भूख की चिंता 

अब व्यर्थ का चिंतन है

हथियारों की होड़ में 

लुट रहा धन है   

भारत ने 

वर्ण-व्यवस्था का 

निरर्थक विकास किया 

और वर्गों में बँटी 

दुनिया में 

कुछ आगे हुआ 

तो कहीं 

बहुत पीछे रह गया 

व्यवस्था बदलने आए 

'तीस मार ख़ान' 

'बंदर के हाथ लगी मशाल'

कहावत चरितार्थ करते रहे। 

© रवीन्द्र सिंह यादव

गुरुवार, 4 अप्रैल 2019

नक़्शा


उस दिन बिटिया नाराज़ हुई थी 

तब चौथी कक्षा में पढ़ती थी 

भूगोल की परीक्षा में 

नक़्शा बनाने के भी नंबर  थे 

नक़्शे बनाते-बनाते 

उसे ग़ुस्सा आया 

मेरे पास आयी 

हाथ में थे कई काग़ज़ 

जिन पर बने थे कई नक़्शे 

लेकिन नहीं थे बनाने जैसे 

बालसुलभ तमतमाहट के साथ 

पूछा मुझसे-

ये नक़्शे टेढ़े-मेढ़े क्यों होते हैं ?

बड़े होकर समझना 

नक़्शों का बदलना     

नक़्शों का मिटना 

नक़्शों में समायी भावना

नक़्शों में निहित संभावना 

तिरोहित होती है भाईचारे की भावना    

क़ुदरत ने दिया था 

बस एक ही नक़्शा भूमि-जल से चहकता  

घुसेड़ दी है हमने नक़्शे में 

विस्तारवादी / संकीर्ण मानसिकता

राजनीति रणनीति और सुरक्षा 

नक़्शे की जड़ में छिपी है महत्त्वाकांक्षा

नक़्शों में सिमटी है आज दुनिया 

सुनते-सुनते गंभीर हुई मुनिया। 

© रवीन्द्र सिंह यादव 

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