यह जो बरसात
आई है
हर बार की तरह
फिर इस बार
सुहानी तो बिल्कुल नहीं
कोढ़ में खुजली-सी
लग रही है इस बार
अभी बाढ़ से आई तबाही
है चर्चा में
कल सूखे की चर्चा होगी
अभी मरनेवालों की चर्चा है
कल
फ़सल-भूखे की चर्चा होगी
करोना महामारी से
जूझ रही दुनिया में
अब मौतों के आँकड़े
दबाए जा रहे हैं
वैक्सीन बनने के
समाचार
कमाऊ मंशा से
फैलाए जा रहे हैं
पीड़ित मानवता का
दम घुट रहा है
कोई दोनों हाथों से
दौलत समेट रहा है
कोई सरेआम लुट रहा है
सरकार-समाज
ज्ञान-विज्ञान
धर्म-ज्योतिष
तर्क-पाखंड
न्याय-मज़लूम
तर्क-पाखंड
न्याय-मज़लूम
सामाजिक मूल्य-अवसरवादी मूल्यविहीन अमूल्य
सभी वक़्त की कसौटी पर
अपनी-अपनी परीक्षा दे रहे हैं
फ़िलहाल
पावस ऋतु में
साफ़ हवा में
पावस ऋतु में
साफ़ हवा में
आशंकित
हम
सांस ले रहे हैं।
हम
सांस ले रहे हैं।
© रवीन्द्र सिंह यादव