समता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
समता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 3 मार्च 2021

फिर जंगली हुआ जाय?

जंगली जीवन से उकताकर 

समाज का सृजन किया 

समाज में स्वेच्छाचारी स्वभाव के 

नियंत्रण का विचार और इच्छाशक्ति 

सामाजिक नियमावली लाई 

नैतिकता की समझ भी आई 

सामाजिक मूल्यों की सुधि आई 

ज्ञान,न्याय,समता,विकास,स्वतंत्रता 

और दंड पर बहस हुई

क़ानून का प्रावधान स्वीकार हुआ 

राजा बादशाह से होते हुए 

जनसेवक का विचार लोकतंत्र लाया 

लोगों ने सोचा अब उन्हें जीना आया 

लोकतंत्र में कब तानाशाही आ गई 

आज़ादी / अभिव्यक्ति जब नियंत्रित हुई

तब होश आया 

लालच और भय की दुदुंभी की गूँज में 

चतुर-चालाक वर्ग को 

सत्ता और पूँजी के साथ खड़ा पाया

तो क्या आज़ादी के लिए 

फिर जंगली हुआ जाय?

या संयमी और समझौतावादी हुआ जाय...? 

© रवीन्द्र सिंह यादव    

 

विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...