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शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

इतरायी नागफनी ख़ुद पर



तान वितान जब
नागफनी ने 
घेरा पूरा खेत,
मरुभूमि ने 
दिली सत्कार किया 
विहँसी भूरी रेत।  

इतरायी 
नागफनी ख़ुद पर 
जब बंध्या-धरती का 
सलोना शृंगार हुई,
सूख गयी जब 
हरियाली चहुओर 
अकाल में पशुओं का 
जीवनरक्षक आहार हुई।  

तन्हा-तन्हा 
जीती रहती नागफनी 
जब खिली हुईं थीं 
रंग-विरंगी फुलवारियाँ,
सुमन-गंध ग़ाएब हुई 
सूख गयीं सारी 
प्यारीं कोमल पंखुड़ियाँ
तब नागफनी ने
व्यथित मन बहलाया 
कम से कम पानी में भी 
दुर्दिन में जीवन जीने का 
झंझावाती मार्ग सुझाया।


© रवीन्द्र सिंह यादव

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