
एक सप्ताह पूर्व
देखा था उदास पीपल को
सहते वर्तमान पतझड़ के
कायाकल्पी कोलाहल को
पातविहीन पीपल
अनावृत अनमनी लाजवंती
शाखाएँ-उपशाखाएँ
बेनूर वृक्ष था पीपल
एक-दो शेष थे पीत पात
लटके थे नीड़ बस छह-सात
आज तो
सुनहले सुकोमल किसलय
झीनी हल्की हरी ओढ़नी-से
लिपट गये हैं
हवा में लहराते हुए
'करोना लॉक डाउन' को
बेअसर बताते हुए
पंछी आकर
पंख फड़फड़ाने लगे हैं
गिलहरी-गिरगिट-बंदर
धमा-चौकड़ी मचाने लगे हैं
इनके ललचाए नैना
मधुयुक्त छत्तों पर लगे हैं
पीपल के नीचे
एक शहरी बेघर का बसेरा है
आती-जाती हरेक ऋतु
उसका नया एक सबेरा है
उसने समेटकर सहेजकर
उम्मीदों का गट्ठर बाँधे
रख लीं हैं झरीं सूखीं पत्तियाँ
सूखी लकड़ी संग
चूल्हा जलाने के लिये।
©रवीन्द्र सिंह यादव

