चल नहीं पाते उठाकर
अब हम क़दम दो-चार
पूर्वाग्रही सूचनाओं की
आयी अजब भरमार
कहते फिर भी हम उसे
निर्भीक निष्पक्ष अख़बार
ज़ेहनियत होती जाती बीमार
समाया रग-रग में भ्रष्टाचार
नैतिकता बेबस खड़ी उस पार
बदल गया है क़ायदा कारोबार
कहीं पौ-बारह कोई हुआ लाचार
मन पर बढ़ता क्रोध का अम्बार
परे होंगे त्रासद मनोविकार
आओ छेड़ें सरगम के तार
प्रकृति को आने दो घर-द्वार
सुनो बच्चों की चुलबुली पुकार
भरेगा भावुक ह्रदय में प्यार।
© रवीन्द्र सिंह यादव
© रवीन्द्र सिंह यादव


