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बुधवार, 29 मई 2024

नदी का स्वभाव

चित्र: महेन्द्र सिंह 

कल-कल करती 

निर्मल नदी को देखो

गतिमान है मुहाने की ओर 

सूरज की तपिश 

संलग्न है 

नदी की काया को 

छरहरा बनाने की ओर 

नदी आशांवित होती है 

पहुँचने मुहाने तक 

सागर में मिलने हेतु  

आगे मिल जाएँगीं 

समा जाएँगीं 

कुछ और छोटी-छोटी नदियाँ

उसकी जलराशि और सौंदर्य में इज़ाफ़ा करने  

नदी उनका 

तिरस्कार नहीं करती है 

आह्लादित होती है 

संगम और समंवय के साथ

मनुष्य,पशु-पक्षियों,पेड़-पौधों का 

सुकून में बदलता है 

प्यास का एहसास

देखकर बहती निर्मल नदी

लगे अंकुश मानवीय महत्वाकांक्षाओं  पर 

तो बहती रहे नदी 

अविरल,अविचल,अविकल,अनवरत 

सदी-दर-सदी कल-कल छल-छल।   

©रवीन्द्र सिंह यादव

शुक्रवार, 19 जनवरी 2024

सर्दी

 

चित्र:महेन्द्र सिंह 

सर्दी तुम हो बलवान 

कल-कल करती नदी का प्रवाह 

रोकने भर की है तुम में जान

जम जाती है बहती नदी 

बर्फ़ीली हवाओं को तीखा बनाने 

आती हो निरीह को सहना सिखाने  

तुम जब कोहरे के पंख लेकर 

उतरती हो धरा पर 

दृष्टि क्षमता घट जाती है जीव की

चिड़िया भी उड़ नहीं पाती पर पसार कर   

अदृश्य हो जाते हैं भानु,शशि और सितारे

भौतिक जीवन चलता है तकनीक के सहारे 

एक ह्रदय है 

धड़-धड़ धड़कता रहता है जीवनभर अनवरत 

जमने नहीं देता धमनियों-शिराओं में बहता रक्त

इसके भी अपने मौसम हैं 

अंगों के सह-अस्तित्त्व को सहेजे  

कुछ मनचीते 

कुछ बोझिल-से!    

©रवीन्द्र सिंह यादव




रविवार, 24 दिसंबर 2023

बादल को बरस जाना है

चित्र: महेन्द्र सिंह 

दो गर्वोन्नत अहंकारी बादल

बढ़ा रहे थे असमय हलचल 

मैंने भी देखा उन्हें

नभ में  

घुमड़ते-इतराते हुए

डराते-धमकाते हुए

आपस में टकराए  

बरस गए

बहकर आ गए 

मेरे पाँव तले

नदी की ओर बह चले

लंबा सफ़र तय करेंगे 

सागर में जा मिलेंगे।  

 ©रवीन्द्र सिंह यादव      

शनिवार, 12 दिसंबर 2020

विरह वेदना

 नाविक नैया खेते-खेते 

तुम चले गए उस पार 

बाट तुम्हारी हेरे-हेरे 

थके नयन गए हार

बादल ठहरे होंगे कहीं 

कहे क्षितिज की रेखा 

संध्या का सफ़र शुरू होगा 

हो न सकेगा अनदेखा

नदी शांत है आ जाओ 

होगा मटमैला पानी

सांध्य-दीप साथ जलाना 

होगी परिपूर्ण कहानी। 

© रवीन्द्र सिंह यादव 

मंगलवार, 14 जुलाई 2020

अनाड़ी नाविक

एक अनाड़ी नाविक

उतरा नदी में

इस यक़ीन के साथ

कि पार लग जाएगा

माहौल से बेपरवाह

मौसम के पैटर्न से अनभिज्ञ

मझधार तक पहुँचा

क्रुद्ध हवा ने

अचानक आकर

विश्वासघात किया

छूने लगी नीर नदी का

मनमानी ताक़त से

उठती-गिरती

तीव्र लहरों में

नाव का बैलेंस

डगमगा गया

अकेली नाव

दूर बहती दिखाई दी!

©रवीन्द्र सिंह यादव 

मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

काल-चक्र

पराजयबोध लिए 

बैठा है मानव 

करोना-काल के 

दुष्कर दुर्दिन में 

भोर-बेला में 

शांत है नदी तट 

दोपहर में 

सन्नाटे को 

गले लगाए है 

वयोवृद्ध विशाल वट

विरह वेदना में 

विचलित है 

सिंदूरी संध्या 

झील में डूबता 

रक्ताभ सूरज 

तलाश रहा है 

विस्फारित नेत्रों से 

प्रकृति का 

कुशल चितेरा 

उदासियों का 

गठा गट्ठर लादे 

बीतेगी अपनी गति से 

अतल अवसाद की 

स्याह ओढ़नी ओढ़े 

झुँझलाई यामिनी

काल का कलन करता 

अभिमान को रौंदता

आएगा एक और सबेरा।

© रवीन्द्र सिंह यादव  

शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

बसंत तुम आ तो गये हो!
















बसंत तुम आ तो गये हो! 
लेकिन कहाँ है...
तुम्हारी सौम्य सुकुमारता ?
आओ!
देखो!
कैसे कोमल मन है हारता।

खेत, नदी, झरने, बर्फ़ीली पर्वत-मालाओं में 
फ़स्ल-ए-गुल के अनुपम नज़ारे, 
बुलबुल, कोयल, मयूर, टिटहरी 
टीसभरे बोलों से बसंतोत्सव को पुकारे। 

अमराइयों में नवोदित मंजरियों का
बसंती-बयार के साथ मोहक नृत्य,
मानव का सौंदर्यबोध से पलायन 
वर्चस्व-चेष्टा के अनेक आलोच्य-कृत्य। 

अभी गुज़र जाओ चुपचाप 
सन्नाटे में विलीन है पदचाप
बदलती परिभाषाओं की व्याख्या में 
अनवरत तल्लीन हैं बसंत-चितेरे। 
© रवीन्द्र सिंह यादव 
    

सोमवार, 19 नवंबर 2018

नदी तुम माँ क्यों हो .....

नदी तुम माँ क्यों हो...?

सभ्यता की वाहक क्यों हो...?

आज ज़ार-ज़ार रोती क्यों हो...?   

बात पुराने ज़माने की है 

जब 

गूगल 

जीपीएस

स्मार्ट फोन  

कृत्रिम उपग्रह 

पृथ्वी के नक़्शे 

दिशासूचक यंत्र 

आदि नहीं थे 

एक आदमी

अपने झुण्ड से 

जंगल की भूलभुलैया-सी 

पगडंडियों पर चलते-चलते 

पैर की नस दबने / चढ़ने / तड़कने से 

भटककर छिटककर बिछड़ गया 

घिसटते-घिसटते 

अग्रसर हुआ 

ऊँचे टीले से 

साथियों को 

आवाज़ लगायी 

कोई सदा  लौट के आयी

बस प्रतिध्वनि ही 

निराश लौट आयी 

सुदूर क्षितिज तक 

व्याकुल थकी नज़र दौड़ायी 

घने वृक्षों के बीच 

नीलिमा नज़र आयी 

जीने की आस जागी 

आँखों में रौशनी जगमगायी

हिम्मत करके उतरा 

ऊँघती कटीली घाटियों में 

चला सुनसान वन में

उस नीलिमा की ओर 

दर्द सहते-सहते हौले-हौले 

पैर को जकड़ा 

नर्म वन लताओं से 

रास्ता तय किया 

एक टीला और मिला 

अब एक नदी नमूदार हुई

चलते-चलते तन से 

निचुड़ा पानी

प्यासे को लगा 

ख़त्म हो जायेगी कहानी 

बढ़ती प्यास ने 

दर्द विस्मित किया 

प्यासे और नदी के बीच 

दूरी न्यूनतर होती गयी 

नदी से कुछ ही दूरी पर 

मूर्छा आने लगी 

पाकर नदी का किनारा 

राहत की साँसें भी भारी हुईं 

तपती रेत में 

बोझिल क़दमों  से 

प्यासा चला 

उभरे पाँवों में 

छालों ने छला  

अब नदी का पानी 

कुछ ही क़दम दूर था 

पाँवों में प्यासे को 

ठंडक महसूस हुई 

लगा ज्यों माँ ने 

लू लगने पर 

तलवों में बकरी का दूध  

और प्याज़ का रस मला हो 

नस तड़की और 

गिर पड़ा औंधे मुँह 

चरम पर थी प्यास और पीर 

बस दो हाथ की दूरी पर था

कल-कल करता बहता 

नदिया का निर्मल नीर  

जलपक्षी जलक्रीड़ा में थे मग्न 

बह रही थी तपिश में 

राहतभरी शीतल पवन  

घिसटकर पानी तक 

पहुँचने की हिम्मत  रही 

एक लहर आयी 

मुँह को छुआ  

लगा जैसे माँ ने 

पिलाया हो पानी 

लगाकर ओक 

जीवन तरंगित हुआ

बिखरा जीवन आलोक 

बैठकर जीभर पानी पिया

जिजीबिषा जीत गयी 

पाकर क़ुदरत का वरदहस्त 

प्यास बुझाकर प्यासे ने  

नदी को माँ कहकर

श्रद्धा से सम्बोधित किया  

साधुवाद दिया 

यह ममता बढ़ती रही

कालान्तर में 

आस्था हो गयी  

इंसान ने नदी को 

माँ जैसा मान-सम्मान 

देने का विचार दिया

परम्पराओं-वर्जनाओं का 

रोपड़-अनुमोदन किया 

नदियों के किनारे 

सभ्यताओं ने 

पैर पसारने का  

अनुकूल निर्णय लिया 

जीवनदायिनी नदिया का 

आज हमने क्या हाल किया है?

समाज का सारा कल्मष 

नदियों में उढ़ेल दिया

क्या फ़ाएदा 

इस ज्ञान-विज्ञान 

आधुनिक तकनीक 

सभ्य समाज की 

तथाकथित समझदारी  का

जिसने इंसान को 

प्रकृति की गोद से 

जबरन अलहदा किया!! 

© रवीन्द्र सिंह यादव



शुक्रवार, 26 मई 2017

सरिता

नदी  का  दर्द... 


कल-कल  करती करवटें बदलती बहती सरिता

का आदर्श  रूप

हो गयी  अब  गए  दिनों  की  बात ,


स्वच्छ  जलधारा  का  मनभावन  संगीत

हो  गयी  अब  इतिहास  की  बात।


शहरीकरण  की आँधी  में

गंदगी  को  खपाने  का

एकमात्र  उपाय / साधन 

एक  बे-बस  नदी  ही  तो  है,

पर्यावरण  पर  आँसू  बहाने  के  लिए

सदाबहार  बहुचर्चित ज्वलंत मुद्दा  

हमारे  द्वारा  उत्पादित  गन्दगी  ही  तो  है।




Yamuna River At Etawah (Uttar Pradesh)


खुले  में  पड़ा  मल  हो

या


सीवर  लाइन  में  बहती  

हमारे द्वारा उत्पादित  गंदगी,

समाज  की  झाड़न  हो

या


बदबूदार  नालों  में  बहती  बजबजाती  गंदगी

सब पहुँचते  हैं  

एक  निर्मल  नदी  की  पवित्रता भंग  करने


जल  को  विषाक्त / प्रदूषित   बनाने।


नदी  के  किनारों  पर

समाज  का  अतिक्रमण,


है  कुंठित  मानवीय  चेष्टाओं  का  

भौतिक  प्रकटीकरण।

प्रपंच के  जाल  में  उलझा  मनुष्य

नदी  के  नाला  बनने  की  प्रक्रिया  को


 देख  रहा  है  लाचारी  से,

नदियों  के  सतत  सिमटने  का  दृश्य

फैलता  जा  रहा  है  पूरी  तैयारी  से।


नदी  के  किनारे  बैठकर

 कविता  रचने  की  उत्कंठा

जर्जर पंख फड़फड़ाकर दम तोड़  रही है,

बहाव  में  छिपी  ऊर्जा को 

मनचाहा रूप  देने के वास्ते 


नदी की धारा भौतिकता मोड़ रही है।


नदी से अब पवित्र विचारों का झौंका नहीं

नाक सिकोड़ने को विवश करता

सड़ांध का ग़ुबार  उठता  है,

हूक  उठती  है  ह्रदय  में

नदी  के  बिलखने  का 

करुण स्वर उभरता है।


नदी अपने  उदगम  पर  पवित्र  है


लेकिन......

आगे  का  मार्ग

गरिमा  को  ज़ार-ज़ार  करता है,


 बिन बुलाये मिलने आ रहा

गंदगी  का  अम्बार


गौरव  को  तार-तार  करता है।


नदी  चीख़ती  है 

कराहती  है

तड़पती है 

कहती  है -


"ज़हरीले रसायन, मल, मूत्र, मांस, मलबा...प्लास्टिक और राख

क्यों मिलाये जा रहे हैं मुझमें...?



मासूम  बचपन  जब  मचलता  है

नदी  में  नहाने  को / जलक्रीड़ा को 

देख  समझकर  मेरा  हाल


कहता  है  मुझे  गंदा  नाला


और  रोक  लेता  है  

अपनी  चंचलता  का  विस्तार

कोई  बताएगा  मुझे...!


आप, तुममें  से


किसी  मासूम  को  न  समझा  पाने  में 


मेरा  दोष  क्या  है ?


©रवीन्द्र  सिंह यादव



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जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...