एक शिल्पी है वक़्त
गढ़ता है दिन-रात
उकेरता अद्भुत नक़्क़ाशी
बिखेरता रंग लिये बहुरँगी कूची
पलछिन पहर हैं पाँखुरियाँ
बजतीं सुरीली बाँसुरियाँ
सृजित करता है
स्याह-उज्ज्वळ इतिहास
पल-पल परिवर्तित प्रकृति
घड़ियाँ करतीं परिहास
नसीम-सा गुज़रता है
हर्ष-विषाद के पड़ावों से
मरहम हो जाता है
आप्लावित होता है भावों से
उजलत मानव अभिलाषा
कोसती है वक़्त को
ख़ुद ठहरकर
सुबह-शाम
दोष देती वक़्त को
वक़्त की गर्दिश को
सीने से लगा लेते हैं हम
ठोकरें और थपेड़े वक़्त के
ज़ेहन में क्यों सजा लेते हैं हम ?
© रवीन्द्र सिंह यादव
उजलत = उतावली,व्यग्र
नसीम = जो दूसरों की सहायता करता हो
