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बुधवार, 29 मार्च 2023

कट रहे हैं दिन

ह्रदय का असहज स्पंदन 

फूलों की गमक-सा 

बिखर गया है

पहाड़ कटने का क्रूर संगीत सुन 

बदन सिहर गया है  

स्मृतियों के खुरदरे फ़र्श पर 

इतिहास का पन्ना खुल गया है

गुमनाम आँसुओं की धार से धुलकर 

निरंकुश सत्ता का मुखौटा 

ख़ौफ़नाक हो गया है

विधि-विधान की लगाम 

किसको सौंप दी हमने

लाचारी की चादर ओढ़ 

लोक सारा सो गया है। 

© रवीन्द्र सिंह यादव   


मंगलवार, 16 मई 2017

इंतज़ार



पतंगे   आएंगे  जलने  सीने में

जिनके सुलगती आग है बाक़ी , 

सुनो     संगीत     जीवन    का 

मनोहर  राग  है  बाक़ी।   (1)




भेजा है ख़त  बहार  ने  लिख 

आ          रही         हूँ        मैं,

जहाँ   पहुँची  नहीं    दुनिया  

अभी  एक  बाग़   है    बाक़ी।  

सुनो   संगीत   जीवन    का 

         मनोहर    राग    है     बाक़ी।   (2) 




कभी    मिलते   नहीं   साहिल 

सिमट    जाती     हैं     दूरियाँ,

सूखी       एक      नदिया       है 

    समुंदर  सा  अनुराग  है  बाक़ी।    

सुनो    संगीत    जीवन      का 

   मनोहर    राग    है   बाक़ी।   (3) 




चुरा   लाओ   कहीं  से   तुम

छलकती   आँख   का  पानी,  

धो  सकूँ    दामन  पर  लगा

 एक  गहरा  दाग़  है   बाकी।  

सुनो   संगीत   जीवन    का 

           मनोहर    राग    है   बाक़ी।  (4 )  




सैयाद  की  मर्ज़ी से मायूसियों में 

घिर      जाना     बेहतर       नहीं ,

पहुँचो मक़ाम   तक   महफूज़  है 

रहनुमा   जो   बेदाग़    है    बाक़ी। 

सुनो      संगीत      जीवन     का 

     मनोहर    राग    है     बाक़ी ।    (5)  




अंधेरों  में सन्नाटों  का  निज़ाम 

डराए      जब     कभी     तुमको 

देख  लेना   आँधियों     में     भी  

जल  रहा  एक  चराग़  है  बाक़ी।

सुनो      संगीत     जीवन     का 

    मनोहर   राग    है    बाक़ी।     (6)  

    

बदलेगा   वक़्त  सुहानी  भोर   का  

              सुरमई       संगीत       लेकर,                 

निकलेगा  चाँद    फिर   अरमानों   का 

सहरा में  चमन  का  सुराग  है  बाक़ी। 

सुनो         संगीत         जीवन     का 

 मनोहर   राग     है     बाक़ी।    (7)  

@रवीन्द्र  सिंह यादव



शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

नैसर्गिकता



सभ्यता    के    सशंकित    सागर    में,

नत-नयन    नैसर्गिकता    की     नाव,

डूबने      न    पाए,

सुदूर      है   किनारा      तो    क्या,

आज     मांझी    को,

सरलता  का  सुरीला  संगीत  सुनाओ,

आई   है  भौतिकता

शो-केस  बनकर ,

बज  रही  है  ढोलक

अक्खड़  स्वभाव  की  तनकर।



मृत्यु    का  भय   त्यागकर,

साहस, संयम और संतुलन  के,

पंख    पतवार    में   लगाओ,

बैठकर  नियति  की  गोद  में,

सोई   हुई   करुणा   जगाओ।  


लौट  आयेंगे

हमारे  खोये  अलंकरण,

खड़े  होकर

अपनी  छत  पर

दाना  चुगने  चिड़िया  को  बुलाओ।

@रवीन्द्र  सिंह  यादव    

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जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...