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सोमवार, 20 अगस्त 2018

दीमक



हमारे हिस्से में 
जो लिखा था 
सफ़हा-सफ़हा से 
वे हर्फ़-हर्फ़ सारे 
दीमक चाट गयी
डगमगाया है 
काग़ज़ से 
विश्वास हमारा 
पत्थर पर लिखेंगे 
इबारत नई  
सिकुड़ती जा रही 
सब्र की गुँजाइश 
बिखरने के 
अनचाहे सिलसिले हैं 
इंसाफ़ की आवाज़ 
कहाँ गुम है ?
किसने आज़ाद हवा के 
लब सिले हैं?

© रवीन्द्र सिंह यादव

शब्दार्थ / WORD MEANINGS 
सफ़हा = पृष्ठ,पन्ना / PAGE 
हर्फ़ = शब्द / WORD 
लब = होंठ / LIP(S)  



शनिवार, 24 मार्च 2018

बर्फ़


सुदूर पर्वत पर

बर्फ़ पिघलेगी

प्राचीनकाल से बहती

निर्मल नदिया में बहेगी

अच्छे दिन की

बाट जोहते 

किसान के लिए

सौग़ात बन जायेगी

प्यासे जानवरों का

गला तर करेगी

भोले पंछियों की 

जलक्रीड़ा में 

विस्तार करेगी 

लू के थपेड़ों की तासीर

ख़ुशनुमा करेगी

एक प्यासा बूढ़ा

अकड़ी अंजुरी में

भर पी जायेगा

जब बर्फ़ीला पानी

निकलेगी एक आह

कहते हुए -

आ रही है

मज़लूम  बर्फ़ 

रिहा होकर 

ज़ालिम के हाथ से

जा रही है 

विलय होने 

नदिया समुन्दर में 

अपना अस्तित्व खोने !

 बदलते रहेंगे मौसम 

फिर-फिर जमेगी बर्फ़ 

सजते रहेंगे ख़्यालात  

हर्फ़-दर-हर्फ़..!! 

#रवीन्द्र सिंह यादव 

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