बीज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बीज लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 11 जनवरी 2026

मानव और प्रकृति

चित्र:महेन्द्र सिंह 

तुम भला क्यों अजनबी हो जाना चाहते हो?

एक मौसम-चक्र परिपूर्ण होते-होते 

कितना कुछ है जो बदल जाता है प्रकृति में 

कली से फूल 

फूल में बीज 

बीजों से फिर नये पौधे 

देखो राह की मिट्टी को 

वर्षा में घुल गयी 

महक बिखेरकर धुल गयी 

हो जब सर्द मौसम की सुहानी धूप 

पर्वतों पर प्रकृति सँवारती है रूप 

नियति-क्रम में हरेक पल 

एक-दूसरे से अजनबी ही तो है...

प्रकृति की सर्वोत्तम कृति 

यानी मानव 

माप-गिन रहा है दूरी,दोष,समय,सामान

व्याकुल है कि लोग कैसे रहें परेशान। 

©रवीन्द्र सिंह यादव 


रविवार, 4 जून 2023

कविता! तुम्हें जीना ही होगा

कविता!

तुम्हें फिर ज़िंदा होना होगा 

घृणा का सागर पीने हेतु 

प्रेम और वैमनस्य के बीच 

बनना होगा पुनि-पुनि सेतु 

पथराई संवेदना पर 

बिछानी होगी 

मख़मली मिट्टी की चादर 

ओक लगाकर 

पीना होगा 

महासागर-सा अप्रिय अनादर

रोपने होंगे बीज सद्भाव के 

सहेजने होंगे 

किसलय-कलियाँ,कुसुम-पल्लव  

मिटाने होंगे दाग़ नासूर-घाव के 

कविता!

तुम्हें जीना ही होगा 

मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए 

प्रबुद्ध मानवता की संरचना के लिए!

© रवीन्द्र सिंह यादव   

        

रविवार, 25 सितंबर 2022

समय के साथ

युगों-युगों में 

समय के साथ 

समाज सभ्य हुआ 

सुसंस्कृत होने की प्रवृत्ति का 

सतत क्षय हुआ

आज अवांछित अभिलाषाओं का 

अनमना आलोक 

अभिशप्त यंत्रणा के 

अंधड़ में ढल गया है 

भव्यता,भौतिकता के 

विस्तार का बीज 

लालच के गर्भ में पल रहा है  

विवेकहीन मस्तिष्क 

भावविहीन ह्रदय

क्षत-विक्षत भावनाओं का 

अंबार लादे 

बैल-सा जुते रहने की 

मंत्रणा कर 

सो गए हैं

आस्तीन का सॉंप डसेगा  

तंद्रा टूटेगी

तब तक  

समय रेत-सा फिसलकर

भावी पीढ़ियों की 

आँखों की किरकिरी बन चुका होगा!

© रवीन्द्र सिंह यादव  


सोमवार, 22 मार्च 2021

मत लिखो कि...

मत लिखो कि सरकार 

भ्रष्ट है 

मत लिखो कि 

निरीह जनता 

सरकारी नीतियों से त्रस्त है

मत लिखो कि 

धूर्त पाखंडी

उन्माद के बीज बो रहे हैं 

मत लिखो कि 

युवा षड्यंत्र के मोहरे हो रहे हैं

मत लिखो कि 

न्याय सहज सुलभ नहीं है 

मत लिखो कि

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अब नहीं है 

मत लिखो कि 

व्यवस्था सड़-गल गई है 

मत लिखो कि 

सत्ता संवेदना को मसल गई है

मत लिखो कि 

ऑक्सीजन के अभाव में बच्चे मर रहे हैं 

मत लिखो कि 

दंगाई संरक्षण में हरी घास चर रहे हैं 

मत लिखो कि 

क़ानून का पालन मनमाना हो रहा है  

मत लिखो कि 

भूख से व्याकुल इलाक़ा रो रहा है 

मत लिखो कि 

शोषण के सूत्र शातिर दिमाग़ों की पूँजी है 

मत लिखो कि 

शिक्षा में मनगढंत विषयों को लाने की क्यों सूझी है

मत लिखो कि 

117 दिन से किसान आंदोलनरत क्यों हैं?

मत लिखो कि 

सरकारी संपत्तियाँ ख़रीदनेवालों संग 

सरकारी उँगलियाँ मित्रवत क्यों हैं?

मत लिखो कि 

दलों को चंदा कैसे मिल रहा है?

मत लिखो कि 

आदमी का ईमान कैसे हिल रहा है?

मत लिखो कि 

गवाह डराए धमकाए ख़रीदे जा रहे हैं 

मत लिखो कि 

पेड़ क्यों काटे जा रहे हैं? 

लिखो कि 

समय का सच 

अचर्चित रहकर गुज़र जाने का हामी है 

स्वतंत्रता खोकर जीवन जीना तो बस नाकामी है!  

© रवीन्द्र सिंह यादव  

   

विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...