उस ख़ामोश स्थितिप्रज्ञ
पहाड़ी तक
जाना चाहता हूँ
उस चरवाहे की
बाँसुरी की
मद्धिम मधुर धुन
सुनना चाहता हूँ
भेड़-बकरियों के झुंड की
हलचल देखना चाहता हूँ
चरवाहे के कुत्ते की निष्ठा
महसूसना चाहता हूँ
पहाड़ी की ऊँचाई से
गहरी खाई में
सूर्य-किरणों को चूमने
गर्दन लंबी करते विशाल वृक्षों को
निहारना चाहता हूँ
सुदूर पहाड़ी से झरते
श्वेताभ झरने से उठता
रुपहला धुआँ
ह्रदय-कपाटों में
उड़ेलना चाहता हूँ...
क्योंकि
नियति-चक्र
अनवरत, अबाध, अविराम अपनी ड्यूटी पर
मानव-ज़ात विज्ञान की सुझायी सलाह पर
बस्तियों-बसेरों में क़ैद है
काश!
लॉकडाउन ख़त्म होने का
अनुकूल वक़्त हो!
और मैं
उस पहाड़ी पर पहुँचकर
प्रकृति की गोद में
सर रखकर
सुकून की गहरी नींद सो जाऊँ
पुनः तर-ओ-ताज़ा होकर
अपने कर्तव्य पर डट जाऊँ।
© रवीन्द्र सिंह यादव
पहाड़ी तक
जाना चाहता हूँ
उस चरवाहे की
बाँसुरी की
मद्धिम मधुर धुन
सुनना चाहता हूँ
भेड़-बकरियों के झुंड की
हलचल देखना चाहता हूँ
चरवाहे के कुत्ते की निष्ठा
महसूसना चाहता हूँ
पहाड़ी की ऊँचाई से
गहरी खाई में
सूर्य-किरणों को चूमने
गर्दन लंबी करते विशाल वृक्षों को
निहारना चाहता हूँ
सुदूर पहाड़ी से झरते
श्वेताभ झरने से उठता
रुपहला धुआँ
ह्रदय-कपाटों में
उड़ेलना चाहता हूँ...
क्योंकि
नियति-चक्र
अनवरत, अबाध, अविराम अपनी ड्यूटी पर
मानव-ज़ात विज्ञान की सुझायी सलाह पर
बस्तियों-बसेरों में क़ैद है
काश!
लॉकडाउन ख़त्म होने का
अनुकूल वक़्त हो!
और मैं
उस पहाड़ी पर पहुँचकर
प्रकृति की गोद में
सर रखकर
सुकून की गहरी नींद सो जाऊँ
पुनः तर-ओ-ताज़ा होकर
अपने कर्तव्य पर डट जाऊँ।
© रवीन्द्र सिंह यादव