मंगलवार, 11 अगस्त 2026

छलनी

आओ

आशाओं को 

महीन छलनी में 

रखकर देखते हैं 

और फिर 

छलनी को 

हौले-हौले 

रीतते हुए देखते हैं

बस देखना है 

आशाएँ 

औंधे मुँह तो नहीं गिरीं

या कोई 

सुगबुगाहट तो नहीं हुई। 

©रवीन्द्र सिंह यादव 

 

5 टिप्‍पणियां:

  1.  आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में  शनिवार 15 अगस्त, 2026 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in  पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

    जवाब देंहटाएं
  2. स्वतंत्रता दिवस पर शुभकामनाएं |

    जवाब देंहटाएं
  3. आशाएँ कल की उम्मीद जगाती हैं, अब वर्तमान में जीना सीखना है, गिरती हैं तो गिरें आशाएँ, हमें अपनी शक्ति पर भरोसा करना है

    जवाब देंहटाएं

आपकी टिप्पणी का स्वागत है.

विशिष्ट पोस्ट

बहुत बीमार था वह दिन ...

वह बीमार दिन  तड़प-तड़पकर गुज़रा  नई दिल्ली में  एक पचपन साल पुरानी  बहुमंज़िला इमारत  भरभराकर ढह गयी सपने सजाने  भविष्य सँवारने  किरायेदार बन र...