मंगलवार, 8 सितंबर 2026

बहुत बीमार था वह दिन ...

वह बीमार दिन 

तड़प-तड़पकर गुज़रा 

नई दिल्ली में 

एक पचपन साल पुरानी 

बहुमंज़िला इमारत 

भरभराकर ढह गयी

सपने सजाने 

भविष्य सँवारने 

किरायेदार बन रहने आये थे 

देश के कर्णधार 

दब गये, कुचल गये 

माँ-बाप को छोड़ गये मझधार

सहायता के लिये तड़पते रहे 

मलबे से विडीओ भेजते रहे 

लँगड़ाती हुई सुबह   

अंधी होकर ढली धूप

कोलाहल से बहरी हुई रात 

निष्ठुर हो गुज़रती रही

लाश पर लाश गुज़रती रही 

दिन की तबियत बिगड़ती रही 

चिड़िया की आँख छलकती रही 

सीने में आग धधकती रही

बिना परों के पक्षी-सी संवेदना

अपनी विवशता पर हाथ मलती रही 

ओह!

बहुत बीमार था वह दिन...!  

©रवीन्द्र सिंह यादव    

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