सौंदर्यमयी स्रोतस्विनी
उतर रही है
अल्हड़ चंचला-सी
पर्वत-श्रृंखला को
छेड़ते श्वेत बादलों कीं
अठखेलियों के बीच
प्रीत पगे प्रियदर्शन पर्वत से
पावन अश्रुधारा-सी
उदधि में अवसान तक
बसाती गई है
किनारे-किनारे कालजयी सभ्यताएँ
मैदानों को करती गई है
ख़ुशहाल आबाद
फैलाए विस्तृत अयाचक बाहें
विकास की सीढ़ियाँ
भारी पड़तीं जा रहीं हैं
नदी के नैसर्गिक किनारे
जबरन सिकोड़तीं जा रहीं हैं
अपनी अभूतपूर्व दुर्दशा पर
लज्जित है पराजित है
कल-कल बहता उज्जवल नीर
पर्वत से कुछ दूर बहकर
दुर्गंधयुक्त विषाक्त स्याह होकर
लाचार नाविक की
किनारे बँधी नाव को
मासूम नई पीढ़ी को
नहीं समझा सकेगा कोई
सदानीरा की पर्वत-सी पीर!
©रवीन्द्र सिंह यादव
शब्दार्थ-
स्रोतस्विनी = नदी ( किसी स्रोत से निकली जलधारा )
अयाचक = जो याचना न करे, न माँगे, कामनारहित
सदानीरा = ऐसी नदी जिसमें सदैव नीर बहता रहे
