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सोमवार, 13 अप्रैल 2020

छत और धूप

करोना काल की 

तालाबंदी ने 

छतें आबाद कर दीं हैं, 

बाग़-बग़िया

सड़कें-गालियाँ

सूनी नाशाद कर दीं हैं। 



छत पर आयी 

किसी रमणी के 

दर्शनार्थ 

आते थे छतों पर युवक,

माँ-बापू की 

आहट पाते ही 

जाते थे 

शरमाकर दुबक।



यह तो 

गए ज़माने की 

आई-गई बात है, 

अब तो 

मोबाइल पर ही 

मनचाही मुलाक़ात है।



वीडियो कॉन्फ़्रेंस 

जुड़े होने का एहसास 

बरक़रार रखे है,

बावरा मन 

तमन्नाओं के सागर में 

उन्मुक्त नौकायन के लिए
  
उम्मीद की पतवार रखे है।



अब छतें निजता का 

ख़याल रखतीं हैं,

पड़ोसियों की हलचल से 

अनभिज्ञ रहने का 

गुमान पाल रखतीं हैं।    



एक-दूसरे के हिस्से की 

चमकीली धूप 

बहुत ऊँचीं छतों ने 

हड़प ली है,

विटामिन-डी की

दवाओं ने 

घरों में खिलौनों की 

जगह हड़प ली है। 



लाचारी में मिली 

धूप ने 

अपना असर किया होगा,

हड्डियों-मांसपेशियों का दर्द

कम हुआ होगा 

दवा-व्यापार का कर्व 

पसर गया होगा। 



इस दौर में 

कुछ ऐसे भी हैं 

जो छतों को मुँहताज हैं

देश की बेघर आबादी

दसकों से  

दरवाज़े-बालकनी के 

इंतज़ार में है 

ताकि वह भी किसी दिन 

ताली-थाली,घंटी बजा सके

दीया-मोमबत्ती जलाकर 

ख़ुद को गर्व से 

देश से जुड़ा 

महसूस सके!
   
©रवीन्द्र सिंह यादव 

शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

क़ानून के हाथ लंबे होते हैं
























उस दिन 

वह शाम 

काले साये में लिपटती हुई 

रौशनी से छिटकती हुई 

तमस का लबादा लपेटे 

जम्हाइयाँ लेती नज़र आयी थी 

तभी गुलशन से अपने बसेरे को 

लौटती नवयुवा तितली

उत्साही दुस्साहस की सैर  

की राह पर चल पड़ी

राह भटकी तो 

भूखे वीरान खेतों की 

मेंड़ों से होकर जाती 

क्षत-विक्षत पगडंडी पर   

चल पड़ी 

बाँसों के झुरमुट से 

आ रहे थे हवा के अधमरे झोंके 

वाहियात सन्नाटा 

दिमाग़ के किवाड़ों की खड़खड़ाहट 

चंचल हवा की फिसलन से 

डरावना माहौल सृजित कर रहा था 

शहर की तरफ़ आते 

सियार से राब्ता हुआ 

सड़ांध मारते पिंजर को 

मौक़ा पाकर मुँह मारते 

कौए, कुत्ते, सियार और गिद्ध से 

न चाहते मुक़ाबिल हुई 

अपने डैने फैलाकर शिकार पर 

आँखें गढ़ाती बाज़ की हिंसक नज़र   

तोते के बच्चे चहचहाते मिले 

शुष्क ठूँठों के कोटरों से झाँकते

तितली सहम गयी 

जब उसने सुनी 

एक दिल दहलाती चीख़

आक्रोश में सराबोर चीत्कार 

कुछ बहसी दरिंदे 

अपने-अपने सर ढाँपकर 

अप्राकृतिक कृत्य करते मिले 

तितली रुकी और अपना 

विचारों का ख़ुशनुमा रोमाँचक सफ़र 

अधूरा छोड़ / गरिमा से आहत हो 

लौट आयी शहर की ओर 

सीधे पुलिस-थाने पहुँची 

जहाँ चल रही थी दारु-पार्टी 

थकी-हारी अलसाई तितली 

बैठ गयी दीवार पर 

याचना का भाव लेकर 

ख़तरों से चौकन्ना होकर

छिपकली ने छलाँग लगायी

तितली जैसे रंगीन शिकार पर 

औंधे मुँह जा गिरी 

मेवा मिश्रित नमकीन की प्लेट में 

पार्टी का मज़ा किरकिरा हुआ 

दीवार पर सहमी चिपकी 

एक पुलिसमैन की आँखें 

टिक गयीं मासूम तितली पर 

तितली ने भी अपनी दारुण याचना 

उन सच्ची आँखों में उड़ेल दी

सम्मोहित किया पुलिसमैन को 

उसने मोबाइल निकाला 

वीडियो सूट करता हुआ 

तितली का अनुसरण करता हुआ 

पहुँचा घटनास्थल पर 

और ख़ुद को कोसने लगा 

तितली को मन ही मन नमन किया

धन्यवाद किया 

क़ानून के हाथ लंबे होते हैं 

यह जताने के लिये / सोया ज़मीर जगाने के लिये! 

 © रवीन्द्र सिंह यादव 



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