शब्दोदधि में डूब जाओ
मुक्ता-से शब्द ढूँढ़ लाओ
ये घिसे-पिटे
उबाऊ चुभते
रसीले शब्दों ने
मन खिन्न किया है
कानों में गूँजते
आँखों से गुज़रते
अर्धमूर्छित शब्द
औंधे मुँह गिरती
कविता के अलंकरण हैं
शब्द अर्थ पाएँगे
जब संवेदना निकलेगी
सड़क पर महसूसने
उन पलायन करते
मज़दूरों की वेदना
जो बची-खुची गृहस्थी को
पोटली में बाँधे
सर पर लादे
और अबोध बच्चों को
काँधों पर लादे
निढाल भार्या
बूढ़ी माँ का हाथ थामे
भूखे-प्यासे
बिन पैसे
महानगरों से
निकल पड़े
लॉक डाउन में
पुलिस अत्याचार को सहते
अपने घरों की ओर
पैदल लम्बे अनिश्चित सफ़र पर
कुछ सफ़र पूरा होते-होते
निकल गये
किसी और दुनिया के सफ़र पर।
© रवीन्द्र सिंह यादव
मुक्ता-से शब्द ढूँढ़ लाओ
ये घिसे-पिटे
उबाऊ चुभते
रसीले शब्दों ने
मन खिन्न किया है
कानों में गूँजते
आँखों से गुज़रते
अर्धमूर्छित शब्द
औंधे मुँह गिरती
कविता के अलंकरण हैं
शब्द अर्थ पाएँगे
जब संवेदना निकलेगी
सड़क पर महसूसने
उन पलायन करते
मज़दूरों की वेदना
जो बची-खुची गृहस्थी को
पोटली में बाँधे
सर पर लादे
और अबोध बच्चों को
काँधों पर लादे
निढाल भार्या
बूढ़ी माँ का हाथ थामे
भूखे-प्यासे
बिन पैसे
महानगरों से
निकल पड़े
लॉक डाउन में
पुलिस अत्याचार को सहते
अपने घरों की ओर
पैदल लम्बे अनिश्चित सफ़र पर
कुछ सफ़र पूरा होते-होते
निकल गये
किसी और दुनिया के सफ़र पर।
© रवीन्द्र सिंह यादव