जंगल की राजधानी में
अचानक
शरद ऋतु में
गर्मी
बढ़ी
हुई हवा से
नज़ाकत नमी नदारत
साँसों
में बढ़ती ख़ुश्की
बहुत हलकान ज़िन्दगी
झरे पीले पत्ते पेड़ों से
घाम में घिसटती घास
तपन से मुरझा गयी
गर्म हवा ने रुख़ किया
अपने आसमान का
दबाव क्षेत्र निर्मित हुआ
ठंडी हवा गर्म हवा का
ख़ाली स्थान भरने
प्रचंड
वेग से बही
सुदूर
से आती हवा
तीव्र
तूफ़ान बनी
विशाल वरिष्ठ वृद्ध वृक्षों की
वक्र शुष्क टहनियाँ
बाँस के गगनचुम्बी झुरमुट
रगड़ने
लगे आपस में
चिंगारियाँ लम्बी
हुईं
उड़ने लगे पलीते
दहकने
लगे शोले
सूखी घास सहायक हुई
जंगल में फैल गयीं
आक्रामक
आग की लपटें
छा गया धुआँ ही धुआँ हर सू
मासूम
वन्य जीव
जलकर टोस्ट बन गये
जंगल का राजा सोता रहा
सुरक्षित महल-सी माँद में
पर्याप्त
भोज्य भंडार के साथ
अधजले
घायल प्राणी
निकाल
रहे थे भड़ास
अपने निकम्मे गुप्तचर तंत्र पर
माँद में भरा धुआँ
बढ़ी असहनीय तपिश
तब खाँसते हुए
वनराज
बाहर आया
कराहते
प्राणियों की पीड़ा देख
मन ही मन ख़ुश हुआ
अगले पल भावी भोजन की
गहन चिंता में मग्न हुआ
जंगली मीडिया फूला न समाया
देखकर
अपने पापों के सबूत
जलकर राख होने की
प्रबल
सम्भावना पर
सुलगते
भयावह जंगल को देख
सजग सक्रिय बुद्धिजीवियों ने
चिंतन
बैठक आयोजित की
सरकार से हवाई बौछार का
विनम्र
आग्रह किया
पर्यावरणप्रेमी आगे आये
हरियाली
के झंडे बैनर लिये।
© रवीन्द्र सिंह यादव