हाँ मैं कश्मीरी लड़की हूँ!
अपने देशवासियों पर भड़की हूँ।
मेरा रंग और बदन पसंद तुम्हें,
ये मनोविकार हैं नापसंद मुझे,
गुल बनो!
गुलफ़ाम को लेने,
आ जाना गुलशन में!
बदल सकोगे जलवायु अपने इलाक़े की?
जिसमें पलकर मैं बड़ी हुई
सुमन पाँख-सी कोमल हूँ
स्त्री का सम्मान करो बदलो सोच सड़ी हुई।
ईद मुबारक उन्हें भी
जो मेरे रंगरूप पर मोहित हैं
ज़ेहन में सिर्फ़ भोग्या का भाव रखते हैं!
© रवीन्द्र सिंह यादव