
बसंत तुम आ तो गये हो!
लेकिन कहाँ है...
तुम्हारी सौम्य सुकुमारता ?
आओ!
देखो!
कैसे कोमल मन है हारता।
खेत, नदी, झरने, बर्फ़ीली पर्वत-मालाओं में
फ़स्ल-ए-गुल के अनुपम नज़ारे,
बुलबुल, कोयल, मयूर, टिटहरी
टीसभरे बोलों से बसंतोत्सव को पुकारे।
अमराइयों में नवोदित मंजरियों का
बसंती-बयार के साथ मोहक नृत्य,
मानव का सौंदर्यबोध से पलायन
वर्चस्व-चेष्टा के अनेक आलोच्य-कृत्य।
अभी गुज़र जाओ चुपचाप
सन्नाटे में विलीन है पदचाप
बदलती परिभाषाओं की व्याख्या में
अनवरत तल्लीन हैं बसंत-चितेरे।
© रवीन्द्र सिंह यादव