मत लिखो कि सरकार
भ्रष्ट है
मत लिखो कि
निरीह जनता
सरकारी नीतियों से त्रस्त है
मत लिखो कि
धूर्त पाखंडी
उन्माद के बीज बो रहे हैं
मत लिखो कि
युवा षड्यंत्र के मोहरे हो रहे हैं
मत लिखो कि
न्याय सहज सुलभ नहीं है
मत लिखो कि
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अब नहीं है
मत लिखो कि
व्यवस्था सड़-गल गई है
मत लिखो कि
सत्ता संवेदना को मसल गई है
मत लिखो कि
ऑक्सीजन के अभाव में बच्चे मर रहे हैं
मत लिखो कि
दंगाई संरक्षण में हरी घास चर रहे हैं
मत लिखो कि
क़ानून का पालन मनमाना हो रहा है
मत लिखो कि
भूख से व्याकुल इलाक़ा रो रहा है
मत लिखो कि
शोषण के सूत्र शातिर दिमाग़ों की पूँजी है
मत लिखो कि
शिक्षा में मनगढंत विषयों को लाने की क्यों सूझी है
मत लिखो कि
117 दिन से किसान आंदोलनरत क्यों हैं?
मत लिखो कि
सरकारी संपत्तियाँ ख़रीदनेवालों संग
सरकारी उँगलियाँ मित्रवत क्यों हैं?
मत लिखो कि
दलों को चंदा कैसे मिल रहा है?
मत लिखो कि
आदमी का ईमान कैसे हिल रहा है?
मत लिखो कि
गवाह डराए धमकाए ख़रीदे जा रहे हैं
मत लिखो कि
पेड़ क्यों काटे जा रहे हैं?
लिखो कि
समय का सच
अचर्चित रहकर गुज़र जाने का हामी है
स्वतंत्रता खोकर जीवन जीना तो बस नाकामी है!
© रवीन्द्र सिंह यादव

