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मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

तुम्हें पत्थर होने में कितने वर्ष लगे?


पृथ्वी की उथल-पुथल 

उलट-पलट

कंपन-अँगड़ाई  

परिवर्तन की चेष्टा 

कुछ बिखेरा 

कुछ समेटा

भूकंप 

ज्वालामुखी 

बाढ़ 

वज्रपात 

सब झेलती है 

सहनशीलता से 

धधकती धरती

जीवन मूल्यों की 

फफकती फ़सल 

देख रहा है 

आकाश मरती  

पत्थर का कोयला  

बनने में 

पेड़ों को 

करोड़ों वर्ष लगे

ओस को देखो

गेंहूँ की हरी पत्तियों पर  

सुबह-सुबह सत्य-सी 

धूप बढ़ते-बढ़ते 

चेतना अदृश्य-सी  

मानव रे!

तुम्हारा 

कोई हिसाब है...

जीते जी 

तुम्हें 

पत्थर होने में 

कितने वर्ष लगे? 

©रवीन्द्र सिंह यादव  




गुरुवार, 26 सितंबर 2019

रहते इंसान ज़मीर से मुब्तला



ये 
ऊँची 
मीनारें  
इमारतें 
बहुमंज़िला 
रहते इंसान 
ज़मीर से मुब्तला। 

वो 
बाढ़ 
क़हर 
न झोपड़ी 
न रही रोटी 
राहत फंड से 
कौन करेगा मौज. © रवीन्द्र सिंह यादव

रविवार, 22 सितंबर 2019

यह कैसा जश्न है ?



अंगारे आँगन में 

सुलग-दहक रहे हैं, 

पानी लेने परदेश 

जाने की नौबत क्यों ?

न्यायपूर्ण सर्वग्राही 

राम राज्य में 

नारी को इंसाफ़ के लिये 

दर-ब-दर भटकना क्यों?

बाढ़ में सब बह गया 

फ़सलें हुईं तबाह 

विदेशों में जलसों की 

बेहूदा ख़बरें क्यों ?

मीडिया की वाहियात ज़्यादतियाँ 

अब असहनीय हैं 

सिर्फ़ अदालतों के दख्ल पर 

केस होते दर्ज़ क्यों ?

© रवीन्द्र सिंह यादव

विशिष्ट पोस्ट

नागरिक और सत्ता

सत्ता का रूप  वीभत्स हो उठता है  जब उसके हो जाते हैं  नुकीले दाँत  पैने-लंबे पंजों के नाख़ुन  आँखों से विलुप्त शील  ह्रदय में बैठ जाती है  स्...