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शनिवार, 19 जुलाई 2025

साँचा

मूल्य

संवेदना

संस्कार 

आशाएँ 

आकांक्षाएँ

एकत्र होती हैं 

एक सख़्त साँचे में 

ढलता है 

एक व्यक्तित्त्व

उम्मीदों के बिना भी 

जीते जाने के लिए

दुनिया के ज़ख़्मों पर 

नेह का लेप लगाने के लिए

यह सहज साँचा 

हमने अब खो दिया है 

भौतिकता के अंबार में 

बहुत नीचे दब गया है।   

©रवीन्द्र सिंह यादव 

 

रविवार, 25 सितंबर 2022

समय के साथ

युगों-युगों में 

समय के साथ 

समाज सभ्य हुआ 

सुसंस्कृत होने की प्रवृत्ति का 

सतत क्षय हुआ

आज अवांछित अभिलाषाओं का 

अनमना आलोक 

अभिशप्त यंत्रणा के 

अंधड़ में ढल गया है 

भव्यता,भौतिकता के 

विस्तार का बीज 

लालच के गर्भ में पल रहा है  

विवेकहीन मस्तिष्क 

भावविहीन ह्रदय

क्षत-विक्षत भावनाओं का 

अंबार लादे 

बैल-सा जुते रहने की 

मंत्रणा कर 

सो गए हैं

आस्तीन का सॉंप डसेगा  

तंद्रा टूटेगी

तब तक  

समय रेत-सा फिसलकर

भावी पीढ़ियों की 

आँखों की किरकिरी बन चुका होगा!

© रवीन्द्र सिंह यादव  


रविवार, 5 अप्रैल 2020

भेड़चाल

मोमबत्ती

उजाले के लिये

सँभालकर रखो,

माचिस की तीली

चूल्हा जलाने के लिये

बचाकर रखो,

जिनके पास

बर्बाद करने के लिये

पर्याप्त भौतिकता है,

वे शौक से

पूर्ण मनोयोग से  

भेड़चाल का हिस्सा बनें!

© रवीन्द्र सिंह यादव

शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

स्त्री और स्वतंत्रता


अनिश्चितता 

असुरक्षा 

अस्थिरता का 

दौर था कभी 

तत्कालीन परिस्थितियोंवश

पूर्वाग्रही मंशा से  

स्त्री को 

जकड़ा गया 

वर्जना की सख़्त बेड़ियों में

वर्जनाओं की मज़बूत कड़ियों में  

सामाजिक नियमावली के 

सुनहरे कड़े जाल में 

स्वतंत्रता से 

रहे परे 

हर हाल में 

आज स्थिरता का 

अनुकूल दौर है 

क़ानून हैं 

सहूलियतें हैं 

अवसर हैं

भौतिकता का अंबार है

अपराध का बाज़ार है 

परिभाषित रिश्ते हैं

गौरव है

 गरिमा है  

पद है 

किंतु  

आज भी 

उसकी एक हद है 

थमा दिया गया उसे 

अदृश्य घोषणा-पत्र

जिसमें 

"डूज़ एन्ड डोंट" 

सीमाओं की लकीरें 

हाईलाइट हो जाती हैं 

फ्लोरोसेंट लाइट में 

चमकती रहती हैं

सतत एहसास दिलाने के लिए  

कि स्वतंत्रता दूर की कौड़ी है!
                       
    © रवीन्द्र सिंह यादव

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

कल और आज




आओ   अब   अतीत   में   झाँकें...

आधुनिकता   ने   ज़मीर

क्षत-विक्षत    कर   डाला   है.



भौतिकता   के   प्रति  

यह   कैसी   अभेद्य   निष्ठा

दर्पण   पर   धूल

छतों   पर   मकड़ी    के   जाले

कृत्रिम   फूल-पत्तियों    में  

जीवन  के   प्रवाह  का  अन्वेषण.



सपने   संगठित   हो    रहे

विखंडित   मूल्यों   की   नींव    पर

भूमि-व्योम   में

कलुषित   विचारों   का     विनिमय

मानवता  के   समक्ष   अबूझ  पहेली.



झूठा   आदर्श  मथ   रहा

मानस   हमारा

त्रासद  है

मन   का   बुझकर   विराम  लेना.



हो   रहे  विलुप्त

दैनिक   जीवन   से

सामाजिक  मूल्य

प्रेम, करुणा,  दया,  सहयोग, चारित्रिक-शुचिता

दूसरों  की   परवाह  में   प्रसन्नता

व्यक्ति  से  कोसों  आगे  चल   रहे  हैं .



आओ   ठिठककर   खोलें

बीते  कल  का  कोई  झरोखा

देखें  सौंदर्यबोध   की   व्यग्रता   से

कितनी  दूर  आ  गये  हैं  हम....!

पदार्थवाद   में

कितना   धंस   चुके   हैं   हम.....!!

#रवीन्द्र सिंह यादव 

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जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...