उमसभरी दोपहरी गुज़री
शाम ढलते-ढलते
हवा की तासीर बदली
ज्यों आसपास बरसी हो बदली
ध्यान पर बैठने का नियत समय
बिजली गुल हुई आज असमय
मिट्टी का दीया
सरसों का तेल
रुई की बाती
माचिस की तीली
उत्सुक मुनिया के नन्हे हाथ
सबने मिलकर जलाई ज्योति पीली
सरसराती शीतल पवन बही
दीये की लौ फरफराती रही
हवा से जूझती रही लौ
दिल की धड़कन हुई सौ
ध्यान लौ पर हुआ केन्द्रित
आई माटी की गंध सुगंधित
दीया ढक दिया काँच के गिलास से
दीया जलता रहा हुलास से
अनुकूल समय बीत रहा था
दीये का दम घुट रहा था
अचानक घुप्प अँधेरा
मैंने मुनिया को टेरा
मोबाइल-टॉर्च जली तो देखा
दीये में तेल भी बाती भी...भाल पर संशय की रेखा
निष्कर्ष के साथ मुनिया बोली-
"ऑक्सीजन ख़त्म होने से बुझ गया है चराग़।"
मेरे ह्रदय ने सुना विज्ञान का नीरस राग।
©रवीन्द्र सिंह यादव