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शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

समुंदरों को दिखा रहा हूँ


मैं अपनी  कश्ती  पार लाकर, 

समुंदरों   को  दिखा  रहा  हूँ। 


जीवन   के  ये  गीत  रचे जो, 

मज़लूमों   को  सुना  रहा हूँ। 


चला हूँ जब से कँटीले पथ पर, 

पाँव   के   छाले  छुपा  रहा हूँ। 


उतर  गया  हूँ  सागर तल में, 

प्यार  के  मोती  उठा  रहा हूँ। 


अहंकार    के    दावानल   में, 

प्रेम  की  बूँदें  गिरा  रहा   हूँ। 


जहाँ बुझ गया चाँद फ़लक का, 

चराग़  होना  सिखा  रहा  हूँ।   


इंसानियत    के    कारवाँ   में, 

जुड़ो  अभी   मैं  बुला  रहा  हूँ। 


उदास   बैठी   सूनी  घाटी  में, 

उम्मीद के फूल खिला रहा हूँ।  


अंधकार   से   डरना   छोड़ो, 

मैं  एक  दीपक  जला रहा  हूँ।  

© रवीन्द्र सिंह यादव


शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

अश्क का रुपहला धुआँ

बीते वक़्त की

एक मौज लौट आयी, 

आपकी हथेलियों पर रची

हिना फिर खिलखिलायी। 


मेरे हाथ पर 

अपनी हथेली रखकर 

दिखाये थे 

हिना  के  ख़ूबसूरत  रंग, 

बज उठा था 

ह्रदय में 

अरमानों का जलतरंग।


छायी दिल-ओ-दिमाग़ पर 

कुछ इस तरह 

भीनी-भीनी महक-ए-हिना, 

सारे तकल्लुफ़ परे रख 

ज़ेहन ने 

तेज़ धड़कनों को 

बार-बार गिना।   


अदृश्य हुआ 

रेखाओं का 

ताना-बाना बुनता 

क़ुदरत का जाल,

हथेली पर 

बिखेर दिया 

हिना ने अपना 

रंगभरा इंद्रजाल। 


शोख़ निगाह 

दूर-दूर तक गयी, 

स्वप्निल अर्थों के 

रंगीन ख़्वाब लेकर 

लौट आयी। 


लबों पर तिरती मुस्कुराहट  

उतर गयी दिल की गहराइयों में, 

गुज़रने लगी तस्वीर-ए-तसव्वुर 

एहसासात की अंगड़ाइयों में। 


एक मोती उठाया 

ह्रदय तल  की गहराइयों से, 

आरज़ू के जाल में उलझाया 

उर्मिल ऊर्जा की लहरियों से। 


उठा ऊपर

आँख से टपका 

गिरा...

रंग-ए-हिना से सजी 

ख़ूबसूरत हथेली पर, 

उभरा अक्स उसमें 

फिर उमड़ा 

अश्क  का रुपहला धुआँ 

लगा ज्यों 

चाँद उतर आया हो 

ज़मीं  पर...! 

© रवीन्द्र सिंह यादव 

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

आँखें


ख़ामोश अदा चेहरे की,

व्यंगपूर्ण मुस्कान 

या 

ख़ुद को समझाता तसल्ली-भाव....?

आज आपकी डबडबाई आँखों में 

आयरिस के आसपास,

तैरते हुए चमकीले मोती देखकर.....

मेरे भीतर भी 

कुछ टूटकर बिखर-सा गया है......!  



ज़ार-ज़ार रोती आँखें 

मुझे भाती नहीं,

आँखें हैं कि

शिकायती-स्लेट बनने से 

अघाती नहीं। 


आपका कभी आँचल भीगता है 

कभी  मेरा  रुमाल,

बह जायें आँसू फिर देखिए  

चंचल नयनों के कमाल। 



दिल किसी का

यादें किसी की, 

सपने किसी के 

चक्षु किसी के,

प्रतीक्षा किसी की 

धड़कन किसी की,  

चैन-ओ-क़रार किसी का 

बे-क़रारी किसी की,

अक्स किसी का 

आँखें किसी कीं, 

दिल में समायी प्रीत किसी की 

कहो कैसा क़ुदरती अनुबंध है?


किसी दामन में सर झुकाकर 

सुकूं मिलता है भरी आँखों को,

क़लम कहाँ लिख पाती है  

 पाकीज़गी-ए-अश्क़ के उन ख़्यालों को।   


आप मेरे दिल में उतरे 

मैं  आपके  दिल  में,

गुफ़्तुगू  ख़ूब  हुई 

दो दिलों की महफ़िल में, 

तड़प के सिवा कुछ मिला क्या....?

खनकते एहसास लिये  

तमन्नाओं का हसीं कारवाँ मिला,

तभी तो चल पड़ा 

इश्क़ का नाज़ुक-सा सिलसिला। 


मैं अपनी गुस्ताख़ी  

ढूँढ़कर  ही  रहूँगा, 

ख़ज़ाना-ए-दिल बहने का 

सबब तलाश कर ही लूँगा, 

क्योंकि आपने 

आज मुझे टफ टास्क दिया है -

"दिल में ऐसा क्या चुभता है 

कि ज़ुबाँ चुप रहती है,

आँखें बयाँ करती हैं?"



कब से हम खुलकर  मुस्काये नहीं 

गये वक़्त की रुस्वाइयाँ  बयां करती हैं,

चेहरे  पर उदासी का पहरा 

और झुकी-झुकी पलकें 

बे-रूखी का क़िस्सा बयां करती हैं। 



है  हार  क़ुबूल  मुझे

नहीं मैं अना-पसंद 

रणछोड़दास जी का 

पथ अनुगमन करता हूँ,

चेहरे पर खिली तबियत हो  

ईष्ट  को  नमन  करता  हूँ।  

बस यही दुआ और इल्तिजा करता हूँ-

ज़िन्दगी को जीभर खिलने-मुस्कराने दो अब,

सपनों में भी आँसुओं को  न ज़ाया  होने दो अब। 

©रवीन्द्र सिंह यादव 

शब्दों के अर्थ /पर्यायवाची / WORD  MEANING 

आयरिस = आँख की पुतली / IRIS / PUPIL 

पाकीज़गी-ए-अश्क़= आँसुओं की पवित्रता / PURITY OF TEARS

सिवा (फ़ारसी पूर्वसर्ग) = सिवाए,अतिरिक्त,अलावा/EXCEPT   

ख़ज़ाना-ए-दिल= आँसू / TEARS 

गुस्ताख़ी  = ढिठाई, बे-अदबी,अशिष्टता /ARROGANCE 

टफ  टास्क = कठिन, चुनौतीभरा  कार्य / TOUGH TASK 

रुस्वाइयाँ = बदनामियाँ / DISGRACES 

अना-पसंद = अहंकारवादी,अहंवादी, अपने अहंकार को आगे रखने वाला / Egotist 

रणछोड़दास =श्रीकृष्ण का एक नाम / LORD KRISHNA 

ज़ाया = बरबाद ,नष्ट, नाश  / WASTE / DESTROY

ज़ार-ज़ार रोती आँखें = अत्यंत फूट-फूटकर रोती हुई आँखें /EYES WEEPING UNCONTROLLABLY  

चैन-ओ-क़रार = मन की शांति / PEACE OF MIND/CONTENTMENT


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