बारिश फिर आ गयी
उनींदे सपनों को
हलके-हलके छींटों ने
जगा दिया
ठंडी नम हवाओं ने
खोलकर झरोखे
धीरे से कानों में
कुछ कह दिया।
बारिश में उतरे हैं
धरा पर कई रंग
शोख़ियाँ-ख़्वाहिशें
सवार होती हैं मेघों पर
यादों के टुकड़े इकट्ठे हुए
तो अरमानों की नाव बही रेलों पर
होती है रिमझिम बरसात
टकराते हैं जब काले गहरे बादल
फिर चमकती हैं बिजलियाँ
भीग जाता है धरती का आँचल।
बदरा घिर आये काले-काले
बावरा मन ले रहा हिचकोले
नाच रहे हैं मयूर वन में
उमंगें उठ रही हैं मन-उपवन में
प्यारे पपीहा के बोल सुन
एक बावरी गुनगुना रही है हौले-हौले
उड़-उड़ धानी चुनरिया मतवाली हवा के बोल बोले।
बूँदों की सुरीली सरगम
पनीले पत्तों की सरसराहट
मिट्टी की सौंधी मोहक महक
हवाओं की अलमस्त हलचल
शीशों पर सरकते पानी की रवानी
सुहाने मौसम की लौट आयी कहानी पुरानी।
खिड़की से बाहर
हाथ पसारकर
नन्ही-नन्ही बूंदों को हथेली में भरना
फिर हवा के झौंकों में लिपटी फुहारों में
तुम्हारे सुनहरे गेसुओं की
लहराती लरज़ती लटों का भीग जाना
याद है अब तक झूले पर झूलना-झुलाना
शायद तुम्हें भी हो...?
कुम्हलाई सुमन पाँखें
निखर उठी हैं
एक नज़र के लिए
लगे हैं चाँद पर घनी घटाओं के पहरे
चला हूँ फिर भी सफ़र के लिए
यादों का जर्जर झुरमुट
हो गया है फिर हरा
मिले हैं मेरे आसूँ भी
है जो बारिश का पानी
तुम्हारी गली से बह रहा।
हमसे आगे
चल रहा था कोई
किस गली में मुड़ गया
अब क्या पता!
बेरहम बारिश ने
क़दमों के निशां भी धो डाले...!
©रवीन्द्र सिंह यादव