हाथ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हाथ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 20 अप्रैल 2020

कश्ती के मुसाफ़िर को

कश्ती के 

मुसाफ़िर को

साहिल की 

है दरकार

बिफरा समुंदर  

अपनी मर्यादा 

लाँघ जाता 

है कभी-कभार

सुदूर किनारे पर 

वो उदास पेड़ की 

शाख़ पर   

शोख़ हवा की 

है शबनमी लहकार 

है तसल्ली 

बस इतनी

अब तक 

साथ निभाती  

अपने हाथ 

है पतवार।   

© रवीन्द्र सिंह यादव 

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

अश्क का रुपहला धुआँ

बीते वक़्त की

एक मौज लौट आयी, 

आपकी हथेलियों पर रची

हिना फिर खिलखिलायी। 


मेरे हाथ पर 

अपनी हथेली रखकर 

दिखाये थे 

हिना  के  ख़ूबसूरत  रंग, 

बज उठा था 

ह्रदय में 

अरमानों का जलतरंग।


छायी दिल-ओ-दिमाग़ पर 

कुछ इस तरह 

भीनी-भीनी महक-ए-हिना, 

सारे तकल्लुफ़ परे रख 

ज़ेहन ने 

तेज़ धड़कनों को 

बार-बार गिना।   


अदृश्य हुआ 

रेखाओं का 

ताना-बाना बुनता 

क़ुदरत का जाल,

हथेली पर 

बिखेर दिया 

हिना ने अपना 

रंगभरा इंद्रजाल। 


शोख़ निगाह 

दूर-दूर तक गयी, 

स्वप्निल अर्थों के 

रंगीन ख़्वाब लेकर 

लौट आयी। 


लबों पर तिरती मुस्कुराहट  

उतर गयी दिल की गहराइयों में, 

गुज़रने लगी तस्वीर-ए-तसव्वुर 

एहसासात की अंगड़ाइयों में। 


एक मोती उठाया 

ह्रदय तल  की गहराइयों से, 

आरज़ू के जाल में उलझाया 

उर्मिल ऊर्जा की लहरियों से। 


उठा ऊपर

आँख से टपका 

गिरा...

रंग-ए-हिना से सजी 

ख़ूबसूरत हथेली पर, 

उभरा अक्स उसमें 

फिर उमड़ा 

अश्क  का रुपहला धुआँ 

लगा ज्यों 

चाँद उतर आया हो 

ज़मीं  पर...! 

© रवीन्द्र सिंह यादव 

विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...