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गुरुवार, 22 दिसंबर 2022

वे बच्चे अब कहाँ हैं ?

वे बच्चे अब कहाँ हैं ?

जो रुक जाया करते थे 

रास्ते में पड़े 

असहाय घायल को उठाकर 

यथासंभव मदद करने

वक़्त ज़ाया होने 

कपड़े ख़ून से सन जाने की 

फ़िक्र किए बग़ैर

पवित्र विचारों का 

पौधा रोपते थे  

वे तड़पते घायल का 

सिर्फ़ वीडियो नहीं बनाते थे 

संवेदना के गहरे गीत रचते थे।  

© रवीन्द्र सिंह यादव  

मंगलवार, 13 दिसंबर 2022

लोकतंत्र

आज गनपत शहर आया 

अध्ययनरत बेटे के लिए 

घी, लड्डू, साग लाया 

हफ़्ता बीते मतदान किया था 

चुनावी-स्याही का निशान 

बायें हाथ की तर्जनी पर मौजूद है

बेटे ने टीवी पर समाचार चैनल लगाया 

शपथ-ग्रहण कार्यक्रम का 

सीधा प्रसारण...

सफ़ेदपोश नेतागण

फूल मालाओं के अंबार    

भव्यता की अनावश्यक चमक-दमक 

शाही भोज के सरकारी इंतज़ाम

सख़्त सुरक्षा-व्यवस्था  

एंकर-एंकरनियों, संवाददाताओं का 

अतिशय जोश देखकर 

गनपत अपनी तर्जनी पर लगा 

नीला निशान निहारने लगा

लोकतंत्र की 

बदलती परिभाषा समझने लगा। 

© रवीन्द्र सिंह यादव  

  

शनिवार, 26 नवंबर 2022

फ़ासला

नवोदित पीढ़ी 

कुछ दशकों बाद 

पहचान लेगी

उसके दिल में 

नफ़रत और हिंसा के बीज 

किसने रोपे थे 

उसके भविष्य के लिए 

देश-विदेश में 

काँटे किसने बोए थे

तब तक

हमारे हृदय की तरह  

गंगा के तट 

और सिकुड़ चुके होंगे...

और प्रौढ़ पीढ़ी के लोग  

शर्म से निरुत्तर 

नज़रें झुकाए खड़े होंगे। 

© रवीन्द्र सिंह यादव 


रविवार, 24 अप्रैल 2022

नासूर

वो जो आप 
दूसरों की 
तबाही
देख  
आहें-चीख़ें
बेबस चीत्कार  
सुन 
मन ही मन 
ख़ुश हो रहे हो 
सदियों पुरानी
कुंठा का
नासूर 
सहला रहे हो!
लानत है 
आपके
सभ्य होने पर 
सामाजिक मूल्य
खोकर जीने पर!

© रवीन्द्र सिंह यादव       



शनिवार, 4 दिसंबर 2021

क्रोध

सूनी यामिनी में 

जलते-जलते क्रोध में 

नज़र चाँद पर जा ठहरी 

सर्दियों की रात में 

न जाने क्यों लगा ज्यों तपती दोपहरी 


शुभ्र शांत शीतल चाँदनी की आभा में 

क्रोध समाता गया 

समाता ही चला गया...

ग्लानिभाव उत्सर्जित हुआ

नहीं होते जब  

चाहे मुताबिक़ 

चीज़ें 

घटनाएँ 

परिस्थितियाँ 

आँकड़े 

हथियार 

लेखनी 

संमुख-वाणी 

लोगों का व्यवहार

जेब का वज़्न

सोचे परिणाम 

तब क्रोध का ज्वालामुखी फूट पड़ता है 

क्रोधित के मस्तिष्क से न्यूरॉन नष्ट करता है 

लक्षित को विचलित करता है 

क्रोधावेग वक्री होने पर 

आकलन होता है 

शारीरिक 

व्यावहारिक 

आर्थिक 

सामाजिक 

वैश्विक नुकसान की अंधी गली का 

आगे बिछा मिलता है असहयोग के रेशों से बुना ग़लीचा 

कितना कोसा गया 

दबाया गया 

आलोचा गया 

बेचारे क्रोध को 

एक विद्रूप मनोविकार 

क्रोधी को 

पछतावे के सरोवर में डुबो देता है 

क्रोध-वृक्ष की जड़ों में 

ईर्ष्या 

राग-द्वेष 

बदलाभाव 

अहंकार 

घृणा

अपमानित करने की मंशा

असफलता से उत्पन्न कुंठा

नकारात्मक बारम्बारता 

स्वयं को सही सिद्ध करने की ठेठ ज़िद 

ग़लत को सही कहने का ढीठपन 

न जाने कब समझेगा इंसान 

क्रोध भी सकारात्मक चादर ओढ़ लेता है 

जब 

खड़ा हो जाता है 

पीड़ित पक्ष के साथ

ताकतवर पर क्रोध करके

निरीह का थाम लेता है हाथ

क्रोध को वृहद उद्देश्यों में

ढलते हुए 

हमने पाया है

क्रोध कुछ सार्थक कथाएँ भी लाया है 

शिव का राजा दक्ष पर क्रोध  

ऋषि वाल्मीकि का

क्रोंच पक्षी के जोड़े से

एक को मारते बहेलिए पर क्रोध

ब्रह्मऋषि विश्वामित्र का महर्षि वशिष्ठ पर क्रोध 

क्रोधी-ऋषि दुर्वासा के श्राप-वरदान में लिपटा क्रोध 

राम का सागर और लक्ष्मण पर क्रोध

रावण का विभीषण पर क्रोध

ऋषि मुचुकुंद का कालयवन पर क्रोध 

कृष्ण का शिशुपाल, दुर्योधन और अश्वास्थामा पर क्रोध 

धृतराष्ट्र का भीम के लौह पुतले पर क्रोध

विद्योत्मा का कालिदास पर क्रोध

रत्नावली का तुलसीदास पर क्रोध

चाणक्य का राजा घनानंद पर क्रोध

कबीर का पाखंडियों पर क्रोध

दंगाइयों का निरीह नागरिकों पर क्रोध 

सम्राट अशोक का कलिंग युद्ध में हाहाकार! 

दिल्ली में नादिर शाह का चालीस दिनों तक नरसंहार!!

इन क्रोधों की कहानियाँ 

साथ लिए फिरता है समाज

फिर भी क्रोध के अंधकूप में बैठा है आज  


बस...बस...बस...!

फ़सादात में 

समाज के सतत उलझते-झगड़ते लड़ते रहने से  

लाभ की पोटली कौन उठा रहा है?

वो जो छिपकर तुम्हें क्रोधी बना रहा है 

अपने लिए अनुकूल माहौल बना रहा है 

तुम तो फटेहाल कंगाल हो जाओगे! 

और क्रोध के कारण को जानकर 

अंत में ख़ुद को ही कोसते रह जाओगे...

© रवीन्द्र सिंह यादव   

 

मंगलवार, 1 जून 2021

बहुत दुःख दिए तूने ऐ करोना

लॉक डाउन 

फिर भी व्यस्त सड़कें

शहर से लेकर गाँव तक 

कुछ साहसी-मजबूर 

दौड़ रहे हैं 

लिए दवाएँ-ऑक्सीजन 

ताकि सांसें टूट न सकें

करोना से जूझते 

वैज्ञानिक 

डॉक्टर 

सहायक स्टाफ़ 

सफ़ाईकर्मी

वाहन-चालक

सुरक्षाकर्मी

ज़मीनी-पत्रकार  

स्वयंसेवी आदि 

देखते जब   

मृत देहों का अंबार

सुनते जब  

संबंधियों-मित्रों शुभचिंतकों की 

चीख़ें और सिसकियाँ

छितराई परेशानी की लकीरें 

असहज पीपीई-किट फ़ेस-शील्ड से ढके 

बेचैन चेहरों पर 

रखते मन-मस्तिष्क पर क़ाबू  

रोककर अपने दिल का रोना 

जुट जाते दुगनी ऊर्जा से 

बचाने सांसों की टूटती डोर

थम रही है 

करोना की दूसरी लहर 

देखेंगे हम राहत का भोर 

किसी को भोगना है वैधव्य 

कोई हुआ अनाथ 

छूटा किसी के 

माता-पिता का साथ

बिछड़ गई किसी की संगिनी 

किसी को छोड़ गई भगिनी 

किसी ने प्यारी बेटी खोई

बेटे के वियोग में 

कोई आँख फूट-फूटकर रोई 

एक वायरस ने 

दे डाली दुनिया को चुनौती

शोध जारी है 

मुकम्मल इलाज के लिए 

काश!वैक्सीन की हालत 

एक अनार सौ बीमार-सी न होती

आशाओं के ग़ुंचे 

ज़रूर खिलखिलाएँगे

वक़्त के दिए ज़ख़्म 

धीरे-धीरे भर जाएँगे।  

© रवीन्द्र सिंह यादव    

रविवार, 16 मई 2021

एम्बुलेंस

शहर में बद-हवासी का आलम 

अस्पतालों-घरों में मातम ही मातम  

सड़कों पर दौड़तीं एम्बुलेंस

ऑक्सीजन लिए 

साँसों को जूझते करोना मरीज़ लिए   

घर से अस्पताल 

अस्पताल-दर-अस्पताल 

प्रतीक्षा करतीं कतार में 

साँसें थमीं तो दौड़ीं शमशान 

पूरी रफ़्तार में 

फिर प्रतीक्षा लंबी कतार में 

दौलत के भूखों का 

कुरूप चेहरा देखा 

इस लघु सफ़र में 

मानवीय संवेदना के किरदार भी 

लिख रहे हैं क्रूर काल के कपाल पर 

ख़ुद को दाँव पर रख 

साँसों की सच्ची कहानी! 

© रवीन्द्र सिंह यादव


शनिवार, 3 अप्रैल 2021

न राहत की सुबह न चैन की दुपहरी है



बसंत को विदा हुए

कुछ अरसा ही बीता है 

कुछ पत्ते झड़ गए 

कुछ को नए रंगों में

खिलने का सुभीता है

बकाइन, पीपल, सेमल को देखो 

पुराने पत्तों के झरने के उपरांत 

कैसे सुनहले-हरे पल्लवों से 

लजाते हुए ख़ुद को ढक रहे हैं  

सुदूर अमराइयों में 

कोकिला की कूक है 

पकती फ़सल देख 

किसान को एमएसपी की हूक है

ख़ून-पसीने की कमाई 

कितनी अनिश्चित है 

किसान की समृद्धि 

किसी और के हाथ में सुरक्षित है 

आसमान में उमड़ते बादल 

दूर-दूर तक उठते धूल के ग़ुबार 

बेमौसमी बेचैनी के विस्तार 

नितांत ठूँठ को भी नहीं सुहाते 

विपरीतताओं से हम कब अघाते 

अन्न के दाने 

खेत से घर 

घर से बाज़ार-दर-बाज़ार 

लिए डोलता है कृषक 

इस सफ़र में 

घात लगाए बैठे लुटेरों से 

दिन-रात जूझता है कृषक 

पतझड़ के बाद 

फिर उगाएगा नए पौधे 

रोपेगा उम्मीद के नए पौधे

यह नियति-चक्र में 

शोषण-चक्रव्यूह की 

साँठगाँठ गहरी है

न राहत की सुबह 

न चैन की दुपहरी है। 

 © रवीन्द्र सिंह यादव 

 




सोमवार, 22 मार्च 2021

मत लिखो कि...

मत लिखो कि सरकार 

भ्रष्ट है 

मत लिखो कि 

निरीह जनता 

सरकारी नीतियों से त्रस्त है

मत लिखो कि 

धूर्त पाखंडी

उन्माद के बीज बो रहे हैं 

मत लिखो कि 

युवा षड्यंत्र के मोहरे हो रहे हैं

मत लिखो कि 

न्याय सहज सुलभ नहीं है 

मत लिखो कि

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अब नहीं है 

मत लिखो कि 

व्यवस्था सड़-गल गई है 

मत लिखो कि 

सत्ता संवेदना को मसल गई है

मत लिखो कि 

ऑक्सीजन के अभाव में बच्चे मर रहे हैं 

मत लिखो कि 

दंगाई संरक्षण में हरी घास चर रहे हैं 

मत लिखो कि 

क़ानून का पालन मनमाना हो रहा है  

मत लिखो कि 

भूख से व्याकुल इलाक़ा रो रहा है 

मत लिखो कि 

शोषण के सूत्र शातिर दिमाग़ों की पूँजी है 

मत लिखो कि 

शिक्षा में मनगढंत विषयों को लाने की क्यों सूझी है

मत लिखो कि 

117 दिन से किसान आंदोलनरत क्यों हैं?

मत लिखो कि 

सरकारी संपत्तियाँ ख़रीदनेवालों संग 

सरकारी उँगलियाँ मित्रवत क्यों हैं?

मत लिखो कि 

दलों को चंदा कैसे मिल रहा है?

मत लिखो कि 

आदमी का ईमान कैसे हिल रहा है?

मत लिखो कि 

गवाह डराए धमकाए ख़रीदे जा रहे हैं 

मत लिखो कि 

पेड़ क्यों काटे जा रहे हैं? 

लिखो कि 

समय का सच 

अचर्चित रहकर गुज़र जाने का हामी है 

स्वतंत्रता खोकर जीवन जीना तो बस नाकामी है!  

© रवीन्द्र सिंह यादव  

   

शुक्रवार, 19 मार्च 2021

विकास और भारत


याद करो 

पिछले पचास वर्ष 

हम 

इतने स्वकेन्द्रित तो नहीं थे

मानसिकता के धरातल पर 

जहाँ आज हैं 

तब इतने तो नहीं थे  

दुनिया 

विकास करती रही

परमाणु बम बनाने की 

अंधी दौड़ चलती रही 

भौतिकता के विस्तार में

संवेदनाविहीन हुई

व्यक्ति की पाशविक कुंठा 

उत्तरोत्तर विकसित हुई 

भूख की चिंता 

अब व्यर्थ का चिंतन है

हथियारों की होड़ में 

लुट रहा धन है   

भारत ने 

वर्ण-व्यवस्था का 

निरर्थक विकास किया 

और वर्गों में बँटी 

दुनिया में 

कुछ आगे हुआ 

तो कहीं 

बहुत पीछे रह गया 

व्यवस्था बदलने आए 

'तीस मार ख़ान' 

'बंदर के हाथ लगी मशाल'

कहावत चरितार्थ करते रहे। 

© रवीन्द्र सिंह यादव

मंगलवार, 5 जनवरी 2021

धूप-छाँव का हिसाब


ऐ धूप के तलबगार
 
तुम्हारी गली तो छाँव की दीवानी है

कम-ओ-बेश यही हर शहर की कहानी है

धूप के बदलते तेवर ऐसे हुए 

ज्यों तूफ़ान में साहिल की उम्मीद  

धूप की ख़्वाहिश में 

अँधेरी गलियाँ कब हुईं ना-उम्मीद

धूप के रोड़े हुए शहर में 

सरसब्ज़ शजर के साथ बहुमंज़िला इमारतें

इंसान की करतूत है 

लूट लेने को आतुर हुआ है क़ुदरती इनायतें  

धूप मनभावन होने का वक़्त सीमित है

धूप-छाँव का रिश्ता नियमित है  

याद आते हैं महाकवि अज्ञेय जी 

धूप से थोड़ी-सी गरमाई उधार माँगते हुए

मानव कहाँ पहुँचा है तरक़्क़ी की सीढ़ियाँ लाँघते हुए...?

छाँव ने क्या-क्या दिया...? 

क्या-क्या छीन लिया...? 

हिसाब लगाते-लगाते जीवन बिता दिया। 

©रवीन्द्र सिंह यादव


शब्दों के अर्थ / WORD MEANINGS 

1.तलबगार = साधक, अन्वेषक, तलाश करनेवाला / SEEKER

2.कम-ओ-बेश = न्यूनाधिक / LESS OR MORE, MORE OR LESS   

बुधवार, 23 दिसंबर 2020

सीढ़ी

 मढ़ा अब कहीं नहीं दिखता 

माटी की भीतों का अँधेरा कक्ष  

था बिना झरोखों का होता 

बिना दरवाज़ों के घरों में

आँगन में सूखते अनाज को 

भेड़-बकरियाँ खा जातीं 

माँ को एक उपाय सूझा 

तीन सूखीं-सीधीं  बल्लियाँ मँगवाईं 

एक बल्ली के एक-एक हाथ लंबे 

कुल्हाड़ी से टुकड़े करवाए 

दो बल्लियों को समानांतर रखा 

टुकड़ों को उनपर आड़ा रखकर 

ठोक दिया सिलबट्टे से 

कील के बड़े भाई कीले को 

एक -एक हाथ के अंतर से 

मढ़ा की भीत से सटाकर 

उपयुक्त कोण पर रखी गई सीढ़ी 

बचपन में सीढ़ी पर चढ़कर 

मढ़ा की छत पर पहुँचने का रोमांच 

ज़ेहन में  अब तक कुलाँचें भर रहा है 

नई पीढ़ी के लिए सीढ़ी के अनेक विकल्प मौजूद हैं 

आड़ी-तिरछी ऊर्ध्वगामी-अधोगामी 

सीधी-घुमावदार या फोल्डेबल सीढ़ी 

वास्तुशिल्प के अनुरूप आदि-आदि वजूद हैं 

सफलता की सीढ़ी 

स्वर्ग की सीढ़ी 

सभ्यता की सीढ़ी 

फ़ायर ब्रिगेड की सीढ़ी 

स्वचालित सीढ़ी 

बिजली विभाग की सीढ़ी

भवन-मज़दूर की सीढ़ी 

दुकानदार की सीढ़ी 

कुएँ-बावड़ी की सीढ़ी 

पहाड़ों में बने खेत सीढ़ी 

सड़क का अतिक्रमण करती सीढ़ी 

लताओं-बल्लरियों का सहारा सीढ़ी 

पर्वतारोहियों की सीढ़ी 

सैनिकों की सीढ़ी 

बाढ़ में बने सैनिक सीढ़ी

हवाई जहाज़ की सीढ़ी 

हेलीकॉप्टर से लटकती सीढ़ी

चोरों-आतंकवादियों की सीढ़ी

सब सीढ़ियों में श्रेष्ठ रही 

दिल में उतरनेवाली सीढ़ी 

ख़ुद में झाँकने को बननेवाली काल्पनिक सीढ़ी

जो बनी जान बचानेवाली सीढ़ी। 

 © रवीन्द्र सिंह यादव



गुरुवार, 19 दिसंबर 2019

पूर्वाग्रह



जामिया मिलिया इस्लामिया

विश्वविद्यालय दिल्ली की

लायब्रेरी में दिल्ली पुलिस ने

अपने बर्बर दुस्साहस के साथ

अध्ययनरत शिक्षार्थियों पर

क्रूरतम लाठीचार्ज किया

एक ओर जब दर्द से कराह रहे हैं युवा

तब समाज का एक तबका

अपनी अपार ख़ुशी ज़ाहिर कर रहा है

क्योंकि धर्म विशेष के लोगों को

पूर्वाग्रहों की पृष्ठभूमि में

इरादतन

अपमानित किया जा रहा है

सरकारी मंशा और हरकतों से

संविधान में धार्मिक भेदभाव को

खुला प्रवेश देकर

संसद से पास होकर सीएबी

अब आ गया है सीएए बनकर

बहुसंख्यकवाद आ गया है

दुर्भावना बनकर

सुरक्षा बल संवेदनाविहीन हो रहे हैं

साम्प्रदायिकता घर कर गयी दिमाग़ों में

रह गये हैं वे तो बस

धूर्त राजनीति का हथियार बनकर।

© रवीन्द्र सिंह यादव

गुरुवार, 21 नवंबर 2019

सुनो विद्यार्थियो!

अरे! सुनो विद्यार्थियो!

 क्यों सड़कों पर

अपना ख़ून बहा रहे हो 

अपनी हड्डियाँ तुड़वा रहे हो

अपनी खाल छिलवा रहे हो 

अपने बाल नुचवा रहे हैं 

अपने कपड़े फटवा रहे हो 

पुलिस की लाठियाँ खा रहे हो 

पुलिस की गालियाँ / लातें खा रहे हो 

क्यों सामान के बोरे-सा ढोये जा रहे हो 

चार-छह बेरहम पुलिसकर्मियों के हाथों

क्यों अपनी गरिमा को तार-तार करवाते हो 

पुरुष पुलिस की कुदृष्टि और उनके हाथों। 


भावी पीढ़ियों की राह आसान करने 

क्यों सहते हो दमन /क्यों पीते हो अपमान के घूँट 

नेताओं,नौकरशाहों,वकीलों पर करम 

छात्र-छात्राओं, किसान, मज़दूर और मज़लूम पर 

बर्बर प्रहार की पुलिस को मिली है खुली छूट 

आप पर प्रहार करता पुलिस का डंडा 

यदि आपने रोकने की जुर्रत की 

तो सरकारी कार्य में बाधा उत्पन्न करने की 

दर्ज़ होगी पेचीदा एफ़आईआर।     


आप ऐसा क्यों नहीं करते 

नेता-अभिनेता क्यों नहीं बनते

छोड़ो सस्ती शिक्षा की माँग 

रचो पाखंडी का अभिनव स्वाँग 

बाँटो दिलों को/ बदलो मिज़ाज को 

छिन्नभिन्न कर डालो समाज को 

बो डालो बीज नफ़रत के 

पालो ख़्वाब बड़ी हसरत के 

कोई डिग्री नहीं /कोई परीक्षा नहीं 

सिर्फ़ जनता को बरगलाकर विश्वास हासिल करो 

मुफ़्त आवास / मुफ़्त हवाई यात्रा / मुफ़्त रेलयात्रा

मिलेगी भारी-भरकम पुख़्ता सुरक्षा 

पेंशन से होगी बुढ़ापे की सुरक्षा 

संसद की केन्टीन का सस्ता खाना खाओ 

अपनों को मलाईदार ठेके दिलवाओ 

अपने और अपनों के  पेट्रोल पम्प

 स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी खुलवाओ

चहेती कंपनियों के शेयर पा जाओ  

और भी न जाने क्या-क्या पाओ 

बिकने का मौक़ा आये तो 

ऊँची क़ीमत पर बिक जाओ 

कोई बिल ख़ून-पसीने की कमाई से 

पूरी ढिठाई से कभी न भरो 

क़ानून से भला क्यों डरो 

अरे! इंसान बनने की चाह में  

क्यों हो इंसाफ़ की राह पर अड़े 

बोलो! बन सकोगे इतने 

बे-हया बे-रहम चिकने घड़े?   

© रवीन्द्र सिंह यादव  

शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

सुनो मेघदूत!



सुनो मेघदूत!

अब तुम्हें संदेश कैसे सौंप दूँ, 

अल्ट्रा मॉडर्न तकनीकी से, 

गूँथा गया गगन,

  ग़ैरत का गुनाहगार है अब, 

राज़-ए-मोहब्बत हैक हो रहे हैं!

हिज्र की दिलदारियाँ, 

ख़ामोशी के शोख़ नग़्मे, 

अश्क में भीगा गुल-ए-तमन्ना, 

फ़स्ल-ए-बहार में, 

धड़कते दिल की आरज़ू, 

नभ की नीरस निर्मम नीरवता-से अरमान,

 मुरादों और मुलाक़ात का यक़ीं, 

चातक की पावन हसरत, 

अब तुम्हारे हवाले करने से डरता हूँ, 

अपने किरदार से कुछ कहने, 

अब इंद्रधनुष में रंग भरता हूँ। 

© रवीन्द्र सिंह यादव    

शुक्रवार, 7 जून 2019

पर्यावरण अधिकारी




 प्रकृति की, 

स्तब्धकारी ख़ामोशी की, 

गहन व्याख्या करते-करते, 

पुरखा-पुरखिन भी निढाल हो गए, 

सागर, नदियाँ, झरने, पर्वत-पहाड़, 

पोखर-ताल, जीवधारी, हरियाली, झाड़-झँखाड़,

क्या मानव के मातहत निहाल हो गए?

नहीं!... कदापि नहीं!!

औद्योगिक क्राँति, पूँजी का ध्रुवीकरण, 

बेचारा सहमा सकुचाया मासूम पर्यावरण,

खोता जा रहा क़ुदरती आवरण। 


अड़ा है अपने कर्तव्य पर,

एक सरकारी पर्यावरण अधिकारी, 

पर्यावरण क्लियरेंस लेना चाहता है, 

निजी प्रोजेक्ट अधिकारी,

साम-दाम-दंड-भेद सब असफल हुए,

चरित्र ख़रीदने के प्रयास निष्फल हुए,  

अंततः याचक ने कारण पूछा,

सरकारी पर्यावरण अधिकारी, 

प्रस्तावित प्रोजेक्ट-साइट पर जाकर बोला-

देखो! वर्षों पुराना इको-सिस्टम, 

पेड़-पौधों पर छायी हसीं रुमानियत, 

कोयल की कुहू-कुहू, 

कौए की काँव-काँव, 

मयूर का मनोहारी नृत्य,

ऑक्सीजन का घनत्व,  

हिरणों की चंचलता, 

चींटियों की निरंतरता,  

चिड़ियों के प्यारे घोंसले,

बघारना लोमड़ी के चोचले,  

तनों में साँप के कोटर,

दादुर की टर्र-टर्र,  

अँधेरी सुनसान यामिनी में, 

दीप्ति उत्पन्न करते, 

जुगनू का निवास,

पेड़ की लचकदार टहनियों पर, 

तुतलाते तोतों का विलास,

प्रकृति का रसमय संगीत, 

फूल-तितली की पावन प्रीत, 

भँवरों का मधुर गुँजन

टिटहरी का करुण क्रंदन   

बंदरों की उछल-कूद, 

मीठे-रसीले अमरुद...

इन्हें मिटाकर, 

क्या पैदा करोगे...!  

ज़हरीला धुआँ, प्रदूषित जल, 

ध्वनि प्रदूषण, मृद्दा प्रदूषण,

कुंद विवेक, वैचारिक प्रदूषण,   

सीमेंट-सरिया का जंगल,

ख़ुद के लिए मंगल, 

रोगों का स्रोत, 

लाचारों की मौत, 

पूँजी का अंबार, 

उत्पादों का बाज़ार, 

मालिक मालामाल, 

उपभोक्ता कंगाल...


निजी प्रोजेक्ट अधिकारी,

चिढ़कर टोकते हुए बोला-

विकास के लिए, 

ये क़ुर्बानियाँ स्वाभाविक हैं, 

पर्यावरण अधिकारी ने अपना निर्णय सुनाया, 

फ़ाइल पर "नो क्लियरेंस" का टैग लगाया, 

मालिक ने मंत्री को फोन लगाया,

पूछा- प्रकृति-प्रेमी सरस्वती-पुत्र को,

ऐसा पद क्यों थमाया?

अब तक कोई सहयोगी, 

लक्ष्मी-पुत्र आपके हाथ नहीं आया?   

यह कैसी "ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस" नीति है?  

हमारे साथ घोर अनीति है! 

 @रवीन्द्र सिंह यादव  


चित्र साभार : मुकुंद 

शुक्रवार, 31 मई 2019

प्रतिबद्धिता




                                      
                                      
तेज़ हवा अचानक बही 

तो नदी में ऊँची लहरें उठीं

नाविक का आत्मविश्वास

हौले-हौले डगमगाया

तो नाव भी डाँवाँडोल हुई

नाव पर सवार यात्री

मझधार में भयाक्रांत हुए

सभी कुशल तैराक न थे

नाविक का अस्थिर हौसला

बढ़ाने के अतिरिक्त

कोई सार्थक उपाय न था

कोई बोला-

क्या हम सबको डुबाओगे?

ठीक है आप आइये

पतवार थामिए

सबको पार लगाइये

नाविक खीझकर बोला

किनारों पर खड़े

दिलेर तैराक

कूद गये क्रुद्ध लहरों के बीच

सहारा दिया नाव को

घबराये यात्रियों को तसल्ली दी 

नाविक का जोश वापस आया

नाव पार लगी

यात्रियों ने जाँबाज़ तैराकों का

आभार माना

अभिनंदन किया 

उनकी प्रतिबद्धिता

अब जीवन के प्रति और प्रगाढ़ हो गयी।

© रवीन्द्र सिंह यादव 
      

शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

आत्महीनता


विकास में पिछड़े 

तो आत्महीनता

घर कर गयी 

विमर्श में पतन हुआ 

तो बदलाभाव और हिंसा 

मन में समा गयी  

भूमंडलीकरण के 

मुक्त बाज़ार ने 

इच्छाओं के 

काले घने बादल 

अवसरवादिता की 

कठोर ज़मीन तैयार की 

सामाजिक मूल्यों की

नाज़ुक जड़ों में 

स्वेच्छाचारिता के   

संक्रमणकारी वायरस की  

भयावह दस्तक!

ख़ुशी के बदलते पैमाने 

नक़ली फूल-पत्तियों से 

सजती निर्मोही दीवार  

मनोरंजन मीडिया करते 

भावबोध पर प्रचंड प्रहार 

यह पॉपुलर-कल्चर 

हमें कहाँ ले जा रहा है ? 

© रवीन्द्र सिंह यादव

रविवार, 3 फ़रवरी 2019

स्टोन क्रशर


पथरीले हठीले 

हरियाली से सजे पहाड़ 

ग़ाएब हो रहे हैं,

बसुंधरा के श्रृंगार  

खंडित हो रहे हैं। 


एक अवसरवादी 

सर्वे के परिणाम पढ़कर 

जानकारों से मशवरा ले, 

स्टोन क्रशर ख़रीदकर 

एक दल में शामिल हो गया। 


चँदा भरपूर दिया 

संयोगवश / धाँधली करके 

हवा का रुख़ 

सुविधानुसार हुआ, 

पत्थर खदान का ठेका मिला 

कारोबार में बरकत हुई,  

कुछ और स्टोन क्रशर की 

आमद हुई।  


खदान पर कार्यरत मज़दूर 

घिरे हैं गर्द-ओ-ग़ुबार से 

पत्थरों को तोड़कर, 

बनती पृथक-पृथक आकार की

बेडौल गर्वीली गिट्टी,

पत्थर होते खंड-खंड 

महीन से महीनतर, 

फिर महीनतम होती

चूरा-चूरा गिट्टी,

मज़दूरों की साँसों के रास्ते 

फेफड़ों में जमा हो रही है, 

और दौलत!

तथाकथित नेता की 

तिजोरियों में!


अगले चुनाव तक 

ठेकेदार नेता हो जायेगा 

और मज़दूर

भगवान को प्यारा हो जायेगा!

© रवीन्द्र सिंह यादव


शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

महिलाओं का मन्दिर प्रवेश


महिलाओं के 

प्रवेश के बाद 

मन्दिर का 

शुद्धिकरण !

समानता के 

अधिकार से 

ऊपर झूलता है 

आस्था का 

अँधानुकरण !!

भावनात्मक 

तनाव-दोहन

कामयाबी का 

सपाट शार्ट-कट! 

है आसान 

अज्ञानियों पर 

रौब-शासन

भव्यता की आड़ में  

ख़ज़ाना सफ़ा-चट!! 

आस्था की जलावन 

भावना के अलाव में 

सरकायी हर बार! 

रूढ़ियों / वर्जनाओं के 

तोड़कर बैरियर 

बदलती सोच 

अभिमान से 

पहुँची उस पार!!

© रवीन्द्र सिंह यादव  

विशिष्ट पोस्ट

जलप्रलय

जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...