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रविवार, 11 जनवरी 2026

मानव और प्रकृति

चित्र:महेन्द्र सिंह 

तुम भला क्यों अजनबी हो जाना चाहते हो?

एक मौसम-चक्र परिपूर्ण होते-होते 

कितना कुछ है जो बदल जाता है प्रकृति में 

कली से फूल 

फूल में बीज 

बीजों से फिर नये पौधे 

देखो राह की मिट्टी को 

वर्षा में घुल गयी 

महक बिखेरकर धुल गयी 

हो जब सर्द मौसम की सुहानी धूप 

पर्वतों पर प्रकृति सँवारती है रूप 

नियति-क्रम में हरेक पल 

एक-दूसरे से अजनबी ही तो है...

प्रकृति की सर्वोत्तम कृति 

यानी मानव 

माप-गिन रहा है दूरी,दोष,समय,सामान

व्याकुल है कि लोग कैसे रहें परेशान। 

©रवीन्द्र सिंह यादव 


बुधवार, 3 फ़रवरी 2021

जीवन के रीते तिरेपन बसंत...

 


जीवन के 

रीते 

तिरेपन बसंत

मेरे बीते 

तिरेपन बसंत  

बसंत की 

प्रतीक्षा का 

हो न कभी अंत

प्रकृति की 

सुकुमारता का 

क्रम-अनुक्रम  

चलता रहे 

अनवरत अनंत 

नई पीढ़ी से पूछो-

कब आया बसंत? 

कब गया बसंत...?  

कलेंडर पत्र-पत्रिकाओं में 

सिमट गया बसंत!

© रवीन्द्र सिंह यादव



शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

असीम वेदना:दीवार / प्रकृति / मानुष


दीवार उठती है

बाँटती है

आचार-विचार

रहन-सहन

दशा-दिशा

अँगारे-धुआँ

कोई सेंध लगाकर

देख लेता है आरपार

एक ओर

कलात्मक चित्रकारी की भरमार

दूसरी ओर

कीलें ठोककर अस्थायी छप्पर

हवा में हवा होती नैतिकता 


के परिवेश में

नंगनाच करती भौतिकता

बैठेंगे खग-वृन्द दीवार पर

किसी की पूँछ

किसी की चोंच

देखेंगे नौनिहाल

दीवार ढोती है

व्यक्ति की निजता

अस्थायी सुरक्षा का पता 

संकीर्णता के कीड़े-मकोड़े

सहती है महत्त्वाकाँक्षा के हथौड़े

प्रकृति सिहर उठती है

असीम वेदना से

सहती है नादान इंसान के

स्वकेन्द्रित क्रिया-कलाप

हवा-पानी धूप-चाँदनी से

कहती है-

भेदभाव हमारी नीयत में नहीं

सारमय नीरव इशारे समझने की दक्षता

उन्मादी मग़्ज़वाली खोपड़ी में नहीं।

© रवीन्द्र सिंह यादव

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जल जीवन है  और मृत्यु भी  बहार है  तो विभीषिका भी जल किलकारी है  और चीख़ भी  इंसानी दंभ को  तोड़ती सीख भी नींव, कंगूरा,  दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे...