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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

समय की स्लेट पर

करोना काल के 

विवश साक्षी हैं हम,

ऐतिहासिक तारीख़ के साथ 

याद किए जाने के 

महत्त्वाकाँक्षी हैं हम। 

दर्ज हो रहे हैं

क़िस्से-दर-क़िस्से 

मानवता के विस्तार 

और संवेदनाविहीन व्यवहार के

समय की स्लेट पर 

लिखी जा रही है इबारत,

पूँजी के आसपास 

टिकी है 

सरकारी 

ग़ैर-सरकारी सोच 

खिड़कियाँ बनाना 

भूल गए हैं हम 

खड़ी कर दी है

भावशून्य इमारत

जिसमें सब दिखेंगे 

हाथ धोते हुए, 

चेहरे पर मास्क का 

अनचाहा भार ढोते हुए।

जिसके पृथक-पृथक तल में 

अपने-अपने कंधों पर 

लिए खड़े हैं हम अपनी लाशें,

विद्वता को नकार 

भीड़ में मुँह छिपाकर 

हम गिन रहे हैं 

अपनी बची-खुचीं सांसें।  

© रवीन्द्र सिंह यादव 

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