बसंत बहार का यौवन थे
अनुपम अद्भुत श्रृंगार थे
ये पीतवर्ण सूखे फूल-पत्ते,
पर्णविहीन टहनियों पर
लटके रह गये हैं अब
मधुमय मधुमक्खी के छत्ते।
अब पेड़ों के नीचे
बिस्तर से बिछ गये हैं
वृक्ष के अलंकरण,
इनमें समाया है दर्द,
आह-मिलन के एहसास
प्रश्न जीवन-मरण।
ख़ुशनुमा फ़ज़ाओं में
सुनहले किसलय बने थे
मधुमास की उमंगें,
सजल नत नयन नियति
धरती-अंबर में लहराती
परिवर्तन की तीव्र तरंगें।
अचकचायीं आवारा हवाएँ
असमय ओले-बारिश
करते बसंत विदाई,
जोड़े हाथ खड़ा कृषक खेत में
क़ुदरत की करे ख़ुशामद
फ़सल-ए-बहार रौंदने में
पतझड़ को दया न आयी।
सड़-गल जाएँगे
सूखे सुमन अकड़ीं पत्तियाँ
खाद बनकर मिट्टी में समाएँगे,
नश्वर जग में कौन अमर है
थे ऋतु में सुषमा जग की
समय-चक्र के साथ पुनः
जीवन महकाने आएँगे।
© रवीन्द्र सिंह यादव
