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शुक्रवार, 27 मार्च 2020

पतझड़ को दया न आयी

बसंत बहार का यौवन थे

अनुपम अद्भुत श्रृंगार थे  

ये पीतवर्ण सूखे फूल-पत्ते,

पर्णविहीन टहनियों पर 

लटके रह गये हैं अब 

मधुमय मधुमक्खी के छत्ते।
  

अब पेड़ों के नीचे 

बिस्तर से बिछ गये हैं

वृक्ष के अलंकरण,

इनमें समाया है दर्द, 

आह-मिलन के एहसास 

प्रश्न जीवन-मरण। 


ख़ुशनुमा फ़ज़ाओं में 

सुनहले किसलय बने थे 

मधुमास की उमंगें,

सजल नत नयन नियति 

धरती-अंबर में लहराती 

परिवर्तन की तीव्र तरंगें। 


अचकचायीं आवारा हवाएँ

असमय ओले-बारिश 

करते बसंत विदाई,

जोड़े हाथ खड़ा कृषक खेत में 

क़ुदरत की करे ख़ुशामद 

फ़सल-ए-बहार रौंदने में 

पतझड़ को दया न आयी। 

  
सड़-गल जाएँगे 

सूखे सुमन अकड़ीं पत्तियाँ 

खाद बनकर मिट्टी में समाएँगे,

नश्वर जग में कौन अमर है

थे ऋतु में सुषमा जग की 

समय-चक्र के साथ पुनः 

जीवन महकाने आएँगे। 

© रवीन्द्र सिंह यादव


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