विकास में पिछड़े
तो आत्महीनता
घर कर गयी
विमर्श में पतन हुआ
तो बदलाभाव और हिंसा
मन में समा गयी
भूमंडलीकरण के
मुक्त बाज़ार ने
इच्छाओं के
काले घने बादल
अवसरवादिता की
कठोर ज़मीन तैयार की
सामाजिक मूल्यों की
नाज़ुक जड़ों में
स्वेच्छाचारिता के
संक्रमणकारी वायरस की
भयावह दस्तक!
ख़ुशी के बदलते पैमाने
नक़ली फूल-पत्तियों से
सजती निर्मोही दीवार
मनोरंजन मीडिया करते
भावबोध पर प्रचंड प्रहार
यह पॉपुलर-कल्चर
हमें कहाँ ले जा रहा है ?
© रवीन्द्र सिंह यादव