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गुरुवार, 27 अगस्त 2026

जलप्रलय

जल जीवन है 
और मृत्यु भी 
बहार है 
तो विभीषिका भी

जल किलकारी है 
और चीख़ भी 
इंसानी दंभ को 
तोड़ती सीख भी

नींव, कंगूरा, 
दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे 
बह गये सब सपने 
उम्मीदें और भरोसे 

तोड़ता सीमाएँ 
सृष्टि का विकराल रूप  
आँचल माटी का 
धरता कैसे-कैसे रूप 

अल्ट्रा मॉडर्न तकनीक 
दृश्य क़ैद करती रही 
जलप्लावन की विकरालता में 
चीख़-पुकार दबती रही 

पुनः सजेंगे सँवरेंगे 
जिजीविषा के क्षितिज 
रोपे जाते रहेंगे  
इंद्रधनुषी आशाओं भरे बीज।    
©रवीन्द्र सिंह यादव

बुधवार, 4 जुलाई 2018

बचपन




बहुत याद आता है
अल्हड़पन में लिपटा बचपन
बे-फ़िक्री का आलम 
और मासूम लड़कपन  
निकलता था 
जब गाँव की गलियों से 
बैठकर पिता जी के कन्धों पर  
लगता था मानो छू लिया हो 
ऊँचा आकाश किलकारी भरकर   
खेत-हार घूमकर लौटते थे 
सवाल-जवाब के दौर चलते थे 
सुनाते थे पिता जी बोध-कथाऐं  
कैसे लड़ोगे जब आयेंगीं बलाऐं 
दोस्तों के साथ धमाचौकड़ी 
खेल-खेल में धक्कामुक्की   
अमिया इमली जामुन 
सब आपस में साझा करते 
झरबेरी के लाल-पीले बेर 
बाग़ों में मीठे अमरुद खाया करते  
अब तो बस यादों में सिमटा है बचपन 
पुनि-पुनि हम क्यों जीना चाहें बचपन?
© रवीन्द्र सिंह यादव


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