जल जीवन है
और मृत्यु भी
बहार है
तो विभीषिका भी
जल किलकारी है
और चीख़ भी
इंसानी दंभ को
तोड़ती सीख भी
नींव, कंगूरा,
दरवाज़े,खिड़कियाँ,झरोखे
बह गये सब सपने
उम्मीदें और भरोसे
तोड़ता सीमाएँ
सृष्टि का विकराल रूप
आँचल माटी का
धरता कैसे-कैसे रूप
अल्ट्रा मॉडर्न तकनीक
दृश्य क़ैद करती रही
जलप्लावन की विकरालता में
चीख़-पुकार दबती रही
पुनः सजेंगे सँवरेंगे
जिजीविषा के क्षितिज
रोपे जाते रहेंगे
इंद्रधनुषी आशाओं भरे बीज।
©रवीन्द्र सिंह यादव


