साहित्य समाज का आईना है। भाव, विचार, दृष्टिकोण और अनुभूति का आतंरिक स्पर्श लोकदृष्टि के सर्जक हैं। यह सर्जना मानव मन को प्रभावित करती है और हमें संवेदना के शिखर की ओर ले जाती है। ज़माने की रफ़्तार के साथ ताल-सुर मिलाने का एक प्रयास आज (28-10-2016) अपनी यात्रा आरम्भ करता है...Copyright © रवीन्द्र सिंह यादव All Rights Reserved. Strict No Copy Policy. For Permission contact.
गुरुवार, 27 अगस्त 2026
जलप्रलय
रविवार, 23 अगस्त 2026
शब्द-युग्म
उसके मुखारबिंद से
उच्चरित हुआ
एक शब्द-युग्म
और लग गये
होम वर्क पर हम
उसके संगी-साथियों ने
सफ़ेद झूठ-सी सफ़ाई दी
ढिंढोरची करने लगे मुनादी।
उत्साही शोधकर्त्ता
पौराणिक ऐतिहासिक संदर्भ खोज लाये
सामाजिक जवाबदेह व्यक्ति
पिता-सा न ढूँढ़ पाये
जो सिखाता रहा
कौन कौआ,
कौन कोयल हर बार
शब्द ऊर्जा रूप बदलती
रहती संरक्षित संसार।
©रवीन्द्र सिंह यादव
शनिवार, 8 अगस्त 2026
वह जेन ज़ी नहीं जेन अल्फा भारत की बेटी...
आक्रोश आवेश में थी वह भारत की बेटी
©रवीन्द्र सिंह यादव
गुरुवार, 23 जुलाई 2026
युवाशक्ति
युवा-पीढ़ी को समर्पित मेरी यह कविता सन 1998 में आकाशवाणी ग्वालियर म.प्र.से प्रसारित हुई थी. आज पुनः स्मृति में गूँज उठी-
युवा हूँ मैं
निरुत्साह से अनछुआ हूँ मैं
अक्षय ऊर्जा का भंडार हूँ मैं
दक्षता धारण किये निडर हूँ मैं
सभ्यता के अथाह सागर की गोद में
अस्तित्त्व में आया हुआ द्वीप हूँ मैं
घृणा के गान से उपजी
प्रचंड आँधियों के बीच जलता हुआ दीप हूँ मैं
घात-प्रतिघात के कठिन दौर से
बेख़ौफ़ गुज़र रहा हूँ मैं
ज़माने की नज़र में अब
चुभता नहीं, सुधर रहा हूँ मैं
गीदड़ों के कोलाहल में
गूँजता हुआ सिंहनाद हूँ मैं
घनेरे बादलों को चीरकर
निकला हुआ शुभ्र चाँद हूँ मैं!
©रवीन्द्र सिंह यादव
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सोमवार, 22 जून 2026
सीढ़ी जो उदास थी...
बुज़ुर्ग सीढ़ी क्या कहे अपनी दास्तान
रोती है ज़ार-ज़ार हो जब सूना मकान
बेफ़िक्र उत्सुक हो चढ़ जाते हैं सीढ़ी
भूतल को सँभलकर उतरते हैं सीढ़ी
ममता, प्रेम, घृणा, आकांक्षा
सब चढ़े-उतरे हैं सीढ़ी से
निर्माता के उर में उतर गयी है
भव्य नियोजित सीढ़ी-दर-सीढ़ी
इस सीढ़ी का वैभवपूर्ण इतिहास
लिखेगा कोई धीर शोधार्थी
आधुनिकता के अंधड़ में सूनी हुई तो क्या
सीढ़ी संग जीने वाले थे रसिक संगी-साथी.
©रवीन्द्र सिंह यादव
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मंगलवार, 2 जून 2026
युद्ध में ध्वस्त हुआ घर
युद्ध में ध्वस्त हुआ घर
गया है तार-तार बिखर
धधकते अंगारों पर
आओ बरसो प्यारे जलधर
गृहस्वामी का कुंबा गया
द्वार पर लहलहाता अमलतास झुलस गया
चींटी,चूहा,चिड़िया,दीमक और कॉकरोच भी
अब गये हैं सारे के सारे मर
बनाई थी जो पेंटिंग
नन्हे सुकोमल हाथों ने
मासूमों के अनमोल रत्न
रंग-बिरंगे खिलखिलाते खिलौने
विद्यार्जन हेतु सहेजी किताबें-क़लम
माँ के बुने हुए गर्म स्वेटर
पिता की सजायी ईंटें
सभी की पसंद सब्ज़ नर्सरी
सहेजे गये भोज्य-पदार्थ-दवाई
आधुनिकता का साज़-ओ-सामान
संभावनाओं का विस्तृत विराट वितान
यादें-रिश्ते-सपने सब
धमाके में ख़ाक हुए जलकर
आत्मग्लानि से भरेगा कभी
वह क्रूर विकृत दिमाग़ भी
बिला गये हैं ये प्राणी और प्रतीक
जिसके वर्ज्य आतप आदेश पर?
© रवीन्द्र सिंह यादव
शब्दार्थ:
1. कुंबा (संस्कृत) = परिवार, घराना, क़बीला
2. सब्ज़ (फ़ारसी) = हरा रंग, रंग में हरी,हरियाली
3. ख़ाक (फ़ारसी)= मिट्टी
4.जलधर(संस्कृत) = बादल, संगीत का एक राग
5. साज़ (फ़ारसी) = संगीत का उपकरण, वाद्ययंत्र
6.आत्मग्लानि (संस्कृत) = पश्चाताप, पछतावा, खेद
7. बिला गये (हिंदी) = ग़ाएब हो गये, विलुप्त हुए
8. वर्ज्य (संस्कृत) = वर्जन, निषेध, मनाही
9. आतप (संस्कृत) = गर्मी, उष्णता,धूप,तपन,ताप
बुधवार, 1 अप्रैल 2026
जारी है युद्ध
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जन्मे
कुबुद्धि बालक
अब तक तो वयोवृद्ध हो चुके हैं
हिंसक उन्माद में डूबकर
मानसिक संतुलन खो चुके हैं
अमेरिका और इज़राइल
मिलकर लड़ रहे हैं युद्ध
अकेले ईरान से
महीना भर भी कम लग रहा है इन्हें
लड़ते-लड़ते भीषण युद्ध
मारे जा रहे हैं मासूम बच्चे
जिनका कोई अपराध नहीं
मारे जा रहे हैं लोग
जिनके पास बचाव के लिये कोई हथियार नहीं
मारे जा रहे हैं लगातार
निरपराध परिंदे और सुकोमल तितलियाँ
जो अनभिज्ञ हैं विकृत मानवीय सोच से
क्या दोष है पर्यावरण का
जो डूब गया है
बिषैले बारूद के गर्द-ओ-ग़ुबार में
सामूहिक मृत्यु को सहज बनाते
विवेकहीन नेताओं के आदेश
भरा है जिनमें तकनीकी आवेश
अपने लिये सुखद मृत्यु की कल्पना में डूबे हैं
धिक्कार है ऐसे संवेदनाविहीन दिमाग़ों पर!
जागो शांति के मसीहाओ!
वक़्त रहते पृथ्वी को वीरान होने से बचा लो!
और कोई कुबुद्धि ऐसी क्षमता में न हो
जो ले जाए दुनिया को
परमाणु-युद्ध की ओर
विवेकशील मस्तिष्क को ही सौंपना
अब देश की बाग-डोर!
© रवीन्द्र सिंह यादव
बुधवार, 1 अक्टूबर 2025
युद्ध और भूख
हम जानते हैं
दुनिया में भूख का साम्राज्य
युद्दों की देन है
फिर भी कुछ खाए-पिए-अघाए
युद्द कैसे हों
इस रणनीति पर
सोचते दिन-रैन हैं
पसरते पूँजी के पाँवों तले
दब गई है चीत्कार भूखों की
अब नहीं टोकती
प्रबुद्ध मानवता
युद्धोन्माद में डूबे दिमाग़ों को
विकृत सोच के हवाले
छोड़ दिया है दुनिया को!
©रवीन्द्र सिंह यादव
शनिवार, 19 जुलाई 2025
साँचा
मूल्य
संवेदना
संस्कार
आशाएँ
आकांक्षाएँ
एकत्र होती हैं
एक सख़्त साँचे में
ढलता है
एक व्यक्तित्त्व
उम्मीदों के बिना भी
जीते जाने के लिए
दुनिया के ज़ख़्मों पर
नेह का लेप लगाने के लिए
यह सहज साँचा
हमने अब खो दिया है
भौतिकता के अंबार में
बहुत नीचे दब गया है।
©रवीन्द्र सिंह यादव
गुरुवार, 1 मई 2025
वक़्त और काया
बादलों की प्रतीक्षा में
अनिमेष अनवरत ताकते हुए
वृक्ष में क्या परिवर्तित हुआ?
ऋतुओं का संधिकाल आते-आते
सूख गए हरित-पीत पत्ते,
कुम्हलाए कोमल किसलय
मुरझा गए सुकोमल सुमनालय
व्याकुलता बढ़ती रही छाल की
काया क्षीण हुई विशाल वृक्ष की
वक़्त का क्या गया
बस स्मृतियों का ख़ज़ाना बढ़ गया
एक वार्षिक वलय और बढ़ गया
मिला कोई घट गया
पानी हवा से हट गया
लू के थपेड़े झेलकर
गुलमोहर खिल उठा
विपरीत मौसम में
कौन किससे रूठा?
©रवीन्द्र सिंह यादव
गुरुवार, 20 मार्च 2025
सत्य की दीवार
सत्य की दीवार
उनका निर्माण था
कदाचित उन्हें
सत्य के मान का भान रहा होगा
सरलता और सादगी का जीवन
उनकी पहचान रहा होगा
मिथ्या वचन,छल,पाखंड,क्रूरता,अन्याय और दंभ
तब उस पवित्र दीवार से
परे ही रहे होंगे
नकारात्मक मूल्यों की गंध पर
विवेक की पंखुड़ियों का
सतत सख़्त पहरा रहा होगा
कालांतर में क्षरण हुआ
सजगता और
सत्य के प्रति आग्रह का
छल अति क्षुधित पाषाण-सा
टकराता रहा सत्य की दीवार से
अंततः दीवार क्षतिग्रस्त हुई
और बन गए झरोखे ही झरोखे
पतित मूल्यों के
उस प्राचीन दीवार में...
©रवीन्द्र सिंह यादव
रविवार, 8 दिसंबर 2024
अभिभूत
बालू की भीत बनाने वालो
अब मिट्टी की दीवार बना लो
संकट संमुख देख
उन्मुख हो
संघर्ष से विमुख हो गए हो
अभिभूत शिथिल काया ले
निर्मल नीरव निर्झर के मार्ग में
हे शिल्पी!
शिलाखंड पर कब से बैठे हो
उठो! मुक्ति-मार्ग संशय से मिलता तो
हर भटके राही को मंज़िल की क्यों फ़िक्र हो!
करो प्रहार हथौड़ा हाथ है
सुगढ़ मूर्ति साकार हो!
©रवीन्द्र सिंह यादव
शब्दार्थ सम्मुख
1. बालू = रेत, बालुका , Sand
2. भीत = भित्ति , दीवार , Wall
3. सम्मुख = सामने, आगे , समक्ष
4. उन्मुख = ऊपर की ओर ताकता हुआ, उत्कंठा से देखता हुआ
5. विमुख = मुँह फेरना, अलग होना, जिसके मुँह न हो, मुखरहित
6. अभिभूत = हारा हुआ , पराजित
7. शिथिल = ढीला-ढाला, थका हुआ,
मंगलवार, 22 अक्टूबर 2024
फूल और काँटा
चित्र साभार: सुकांत कुमार
SSJJ
एक हरी डाल पर
फूल और काँटा
करते रहे बसर
फूल खिला, इतराया
अपने अनुपम सौंदर्य पर
महक ने दूर तक पसारे पर
काँटा भी नुकीला हुआ,
सख़्त हुआ अभिमान से बेअसर
उन्मादी हवा बही
साएँ-साएँ सरसर-सरसर
काँटा हुआ पंखुड़ी के
आरपार एक दोपहर
धूप-बारिश की मार
हुई धुआँधार गाँव-शहर
तितली-भँवरे,कीट-पतंगे,
रसिक कविवर
गाते गुणगान फूल का
मन भर कर
काँटा तो चुभन की
पीड़ा देता चुभकर
जिस फूल की रक्षा में
काँटा झेलता रहा आलोचना जीभर
वही एक दिन
लगा किसी के हाथ
और मुरझाया सेज पर सजकर
अब काँटा जी रहा
एकाकी जीवन मन मार कर
नियति-चक्र में
फूल-काँटे साथ रहते
विपरीत स्वभाव होकर
फूल-काँटे पनपते रहेंगे
मौसमों की मार सहकर।
©रवीन्द्र सिंह यादव
शुक्रवार, 19 जनवरी 2024
सर्दी
सर्दी तुम हो बलवान
कल-कल करती नदी का प्रवाह
रोकने भर की है तुम में जान
जम जाती है बहती नदी
बर्फ़ीली हवाओं को तीखा बनाने
आती हो निरीह को सहना सिखाने
तुम जब कोहरे के पंख लेकर
उतरती हो धरा पर
दृष्टि क्षमता घट जाती है जीव की
चिड़िया भी उड़ नहीं पाती पर पसार कर
अदृश्य हो जाते हैं भानु,शशि और सितारे
भौतिक जीवन चलता है तकनीक के सहारे
एक ह्रदय है
धड़-धड़ धड़कता रहता है जीवनभर अनवरत
जमने नहीं देता धमनियों-शिराओं में बहता रक्त
इसके भी अपने मौसम हैं
अंगों के सह-अस्तित्त्व को सहेजे
कुछ मनचीते
कुछ बोझिल-से!
©रवीन्द्र सिंह यादव
शुक्रवार, 12 जनवरी 2024
भेड़ की ऊन
मासूम भेड़ की ऊन
आधुनिक मशीनों से
उतारी जा रही है
भेड़ की असहमति
ठुकराई जा रही है
ज़बरन छीना जा रहा है
सौम्य कोमल क़ुदरती कवच
है कैसा इंसानी बुद्धिमत्ता का सच
तौहीन सहते-सहते
गुज़ारेगी ठंड का मौसम
कोसते काँपते-ठिठुरते हुए
कोई लुत्फ़ उठा रहा होगा
सर्दी के मौसम में इच्छित उष्णता का
ऊनी रज़ाई ओढ़ते हुए!
©रवीन्द्र सिंह यादव
रविवार, 24 दिसंबर 2023
बादल को बरस जाना है
दो गर्वोन्नत अहंकारी बादल
बढ़ा रहे थे असमय हलचल
मैंने भी देखा उन्हें
नभ में
घुमड़ते-इतराते हुए
डराते-धमकाते हुए
आपस में टकराए
बरस गए
बहकर आ गए
मेरे पाँव तले
नदी की ओर बह चले
लंबा सफ़र तय करेंगे
सागर में जा मिलेंगे।
©रवीन्द्र सिंह यादव
शनिवार, 2 दिसंबर 2023
अँधेरा-उजाला और भूख
रात का काजल कितना काला
भोर प्रतीक्षा-सा हुआ निवाला
देती चिड़िया चूजों को आश्वासन
सूरज निकले तब मिलेगा राशन
अनमनी रवीनाएँ ले-ले जम्हाई
बिखरा देंगीं धूप जो है अलसाई
भूख से लड़ने भरेंगे पंख उड़ान
किसके माफिक हुआ है जहान?
©रवीन्द्र सिंह यादव
शब्दार्थ:
1. निवाला (हिंदी) = कौर,गस्सा,ग्रास
2. राशन / RATION (English) = खाद्यान्न आदि का निश्चित व नियंत्रित मात्रा में वितरण,रसद (अरबी,फ़ारसी)
3. अनमनी (हिंदी) = बेमन से, अप्रसन्न
4.रवीनाएँ = सूरज की किरणें,रश्मियाँ
5.जम्हाई (हिंदी) = उबासी, जागते समय मुँह के खुलने की स्वाभाविक प्रक्रिया,जँभाई (देशज), उच्छ्वास (संस्कृत)
6. अलसाई (हिंदी) = आलसयुक्त,आलस से भरी, सुस्त
7.माफिक (संस्कृत) = अनुकूल,अनुसार, मुवाफ़िक़ (अरबी)
8.जहान/जहाँ (फ़ारसी) = संसार,दुनिया,लोक,जगत्
सोमवार, 20 नवंबर 2023
झाड़ी और शिशु
झाड़ी हाँफ रही थी
उस रात
जब
ख़ुशी मनाने की सनक
ऐसी कि धमाके की क्रूर ध्वनि
दूर-दूर तक पहुँचे
ख़ुशी दीवाली की हो
या मैच जीतने की
बारूद का धुँआँ
झाड़ी की पत्तियों के
स्टोमेटा का
मुख अवरुद्द करता
कुछ दिन उपरांत
झाड़ी सूख जाती है
बारूदी धुँएँ के महीन कण
मासूम बच्चों के फेफड़ों में
जबरन धँस जाते हैं
उनकी तड़प बढ़ा देते हैं
श्वास-प्रश्वास का विधान
विकृत कर देते हैं
जिसे सुनकर
समझदार लोग
एयर प्यूरीफायर लगे घर से
मुख पर मास्क लगाकर
बस इतना ही कहते हैं-
बच्चा भूखा होगा...
©रवीन्द्र सिंह यादव
सोमवार, 24 जुलाई 2023
दो विवाहित औरतें
दो विवाहित औरतें
भारत के विखंडन को
आईना दिखा रही हैं,
इतिहास
इन्हें अवश्य याद रखे
यही तो कह रही हैं l
अपने-अपने देशों में
घृणा बढ़ानेवाला इतिहास
मासूम बच्चों को
पढ़ानेवालो सावधान!
सीमा हैदर की
अपने चार बच्चों सहित
भारत में अवैध घुसपैठ पर
अंजू का वीज़ा के साथ
पाकिस्तान में प्रवेश
नहीं है अंतिम समाधान!
©रवीन्द्र सिंह यादव
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शनिवार, 22 जुलाई 2023
मोर और साँप
मोर तुम सुंदर हो,
मनमोहक हो,
मृदुल कंठ निराला शबाब है,
तुम्हारा नृत्य तो लाजवाब है,
तुम साँप खाते हो...
फिर भी ज़हरीले नहीं!
बोलो कोई जवाब है?
©रवीन्द्र सिंह यादव
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