युवा-पीढ़ी को समर्पित मेरी यह कविता सन 1998 में आकाशवाणी ग्वालियर म.प्र.से प्रसारित हुई थी. आज पुनः स्मृति में गूँज उठी-
युवा हूँ मैं
निरुत्साह से अनछुआ हूँ मैं
अक्षय ऊर्जा का भंडार हूँ मैं
दक्षता धारण किये निडर हूँ मैं
सभ्यता के अथाह सागर की गोद में
अस्तित्त्व में आया हुआ द्वीप हूँ मैं
घृणा के गान से उपजी
प्रचंड आँधियों के बीच जलता हुआ दीप हूँ मैं
गीदड़ों के कोलाहल में
गूँजता हुआ सिंहनाद हूँ मैं
घनेरे बादलों को चीरकर
निकला हुआ शुभ्र चाँद हूँ मैं!
©रवीन्द्र सिंह यादव
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आभार भाई रवीन्द्र जी
जवाब देंहटाएंअक्षय ऊर्जा का भंडार हूँ मैं
दक्षता धारण किये निडर हूँ मैं
रेखांकित पंक्तिया
सादर वंदन